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International Tiger Day: बाघों ने बदली कॉर्बेट की तस्वीर, पर्यटन से रोजगार तक बढ़ी रफ्तार

Uk Fast Khabar July 29, 2026

बाघों के लिए सबसे मुफीद जगह है उत्तराखंड का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, खूब फल-फूल रहा कुनबा, अब बढ़ते टाइगर घनत्व और मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती

रामनगर: हर साल 29 जुलाई को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है. यह दिन सिर्फ बाघों के संरक्षण का संदेश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात की समीक्षा की जाती है कि बाघों को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयास कितने सफल हो रहे हैं? भविष्य में कौन-कौन सी चुनौतियां सामने हैं? अगर बाघों के संरक्षण की बात करें तो भारत ने बड़ी सफलता हासिल की है. इसमें उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का बड़ा योगदान है.

दरअसल, कॉर्बेट में लगातार बढ़ता बाघों का कुनबा न सिर्फ प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता की कहानी बयां कर रहा है, बल्कि इसने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और पर्यटन की तस्वीर भी बदल दी है. बाघ बढ़े तो पर्यटक भी बढ़े हैं. सफारी बढ़ी और होटल, रिजॉर्ट, होमस्टे, जिप्सी संचालन और नेचर गाइड जैसे रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं, लेकिन अब सवाल ये है कि बढ़ती बाघों की संख्या के साथ कॉर्बेट के सामने चुनौतियां कितनी बड़ी हो गई हैं?

प्रोजेक्ट टाइगर से बढ़ी बाघों की संख्या: गौर हो कि साल 1973 में जब देश में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई थी, तब भारत में बाघों की संख्या करीब 1,411 दर्ज की गई थी. इसके बाद संरक्षण के प्रयासों का असर लगातार दिखाई दिया. साल 2010 में देश में बाघों की संख्या 1,706, साल 2014 में 2,226, साल 2018 में 2,967 और साल 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना में यह संख्या बढ़कर 3,682 तक पहुंच गई.

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी बढ़ी बाघों की संख्या: वहीं, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है. साल 2006 में यहां करीब 150 बाघ दर्ज किए गए थे, जो साल 2010 में 184 और साल 2014 में 215 तक पहुंच गए. साल 2022 की गणना में कॉर्बेट में 260 से ज्यादा बाघों की मौजूदगी है. जबकि, कॉर्बेट और आसपास के लैंडस्केप को मिलाकर यह संख्या 300 से ज्यादा मानी जाती है.

पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है कॉर्बेट टाइगर रिजर्व: करीब 1,288 वर्ग किलोमीटर में फैला कॉर्बेट टाइगर रिजर्व बाघों के घनत्व के लिए पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है. यहां का प्राकृतिक आवास, पर्याप्त जल स्रोत और समृद्ध जैव विविधता बाघों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है, लेकिन बाघों की बढ़ती संख्या का असर जंगल की सीमाओं से बाहर भी दिखाई देता है.

बाघों ने बढ़ाए रोजगार के मौके: बाघों को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक कॉर्बेट पहुंचते हैं, पर्यटन बढ़ा तो जिप्सी चालक, जिप्सी मालिक, नेचर गाइड, नेचुरलिस्ट, होटल, रिजॉर्ट और होमस्टे से जुड़े हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए. स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी इससे नई रफ्तार मिली.
इस पर वन्यजीव प्रेमी संजय छिम्वाल कहते हैं कि साल 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुई ग्लोबल टाइगर समिट के दौरान दुनिया के टाइगर रेंज देशों में बाघों की आबादी को सुरक्षित करने और उनकी संख्या बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया था. भारत ने इस लक्ष्य को निर्धारित समय से पहले ही हासिल कर लिया है. उन्होंने कहा कि आज देश में 3,600 से ज्यादा बाघ हैं.

“बाघों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से संरक्षण की सफलता है, लेकिन कॉर्बेट में बाघों का घनत्व काफी ज्यादा होने के कारण सीमित क्षेत्र में क्षेत्र और संसाधनों को लेकर दबाव भी बढ़ रहा है. ऐसे में बाघों को दूसरे सुरक्षित वन क्षेत्रों से जोड़ना और उनके प्राकृतिक आवास का विस्तार करना जरूरी है. इससे बाघों पर दबाव कम करने के साथ आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में भी मदद मिलेगी.”- संजय छिम्वाल, वन्यजीव प्रेमी

वहीं, वन्यजीव प्रेमी और नेचुरलिस्ट दीप मलकानी का कहना है कि प्रोजेक्ट टाइगर के बाद देश में बाघ संरक्षण के प्रयासों से इनकी संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. इसका सीधा फायदा पर्यटन से जुड़े लोगों को मिला है. दीप मलकानी के मुताबिक, बाघों की संख्या बढ़ने के साथ होटल, रिजॉर्ट, होमस्टे, नेचर गाइड, जिप्सी चालक और जिप्सी मालिकों समेत पर्यटन से जुड़े कारोबारियों की आय में बढ़ोत्तरी हुई है.

“बाघों की संख्या बढ़ने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती भी बढ़ी है. इसलिए बाघ संरक्षण के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी प्रभावी नीतियां बनाना जरूरी है.”- दीप मलकानी, नेचुरलिस्ट

बाघों के संरक्षण से पारिस्थितिकी तंत्र हो रहा सुरक्षित: वहीं, वन्यजीव विशेषज्ञ बच्ची सिंह बिष्ट बताते हैं कि साल 2010 में रूस में हुई बैठक के दौरान 13 टाइगर रेंज देशों ने बाघों की संख्या को दोगुना करने का लक्ष्य तय किया था. आज भारत में 58 टाइगर रिजर्व हैं और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व को देश के पहले टाइगर रिजर्व होने का गौरव हासिल है.

“बाघ खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर होता है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. इसलिए बाघों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाना नहीं, बल्कि पूरे जंगल और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है. बाघों की संख्या बढ़ने के साथ कॉर्बेट में पर्यटन का विस्तार हुआ और स्थानीय ग्रामीणों तथा युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिले हैं.”- बच्ची सिंह बिष्ट, वन्यजीव विशेषज्ञ

वहीं, कॉर्बेट क्षेत्र के होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिमान सिंह का कहना है कि बाघों की संख्या बढ़ने के साथ जंगल और वन्यजीवों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय लोगों में वन्यजीव संरक्षण को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है. उन्होंने कहा कि बाघों की वजह से कॉर्बेट का पर्यटन लगातार बढ़ा है और जिप्सी चालक, जिप्सी मालिक, नेचर गाइड, होटल, रिजॉर्ट और होमस्टे से जुड़े हजारों लोगों को रोजगार मिला है. बाघ की वजह से ही यह सब संभव हो पाया.

“पहले जहां लोग वन्यजीवों की गतिविधियों की जानकारी अपने स्तर पर संभालने की कोशिश करते थे, तो वहीं अब किसी वन्यजीव की मौजूदगी या घटना की सूचना सबसे पहले वन विभाग को दी जाती है. स्थानीय लोग वन विभाग के साथ मिलकर वन्यजीव संरक्षण में सहयोग कर रहे हैं.”- हरिमान सिंह, अध्यक्ष, होटल एसोसिएशन

क्या बोले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर? वहीं, मामले में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर डॉ. साकेत बडोला कहते हैं साल 2010 के बाद रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुई पहली ग्लोबल टाइगर समिट में हर साल ग्लोबल टाइगर डे मनाने का निर्णय लिया गया था. इस दिन का उद्देश्य बाघ संरक्षण और सुरक्षा के लिए किए जा रहे कार्यों की समीक्षा करना, आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना और संरक्षण के सामने आ रही नई चुनौतियों पर चर्चा कर भविष्य की रणनीति तैयार करना है.

“भारत बाघों की संख्या के मामले में दुनिया में अग्रणी है और साल 2010 के बाद बाघों की संख्या को दोगुना करने का लक्ष्य भी देश ने हासिल किया है. इसमें कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का महत्वपूर्ण योगदान है. कॉर्बेट में 260 से ज्यादा बाघ हैं और यहां बाघों का घनत्व भी काफी ज्यादा है.“- साकेत बडोला, डायरेक्टर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व

बाघों ने पर्यटन के विस्तार में निभाई अहम भूमिका: उन्होंने कहा कि बाघों की संख्या बढ़ने के साथ पर्यटन के विस्तार के रूप में कई अवसर पैदा हुए हैं. स्थानीय ग्रामीणों को रिजॉर्ट, नेचर गाइड, जिप्सी चालक और नेचुरलिस्ट के तौर पर रोजगार मिला है. कॉर्बेट की पहचान देश-विदेश में मजबूत हुई है और विदेशी पर्यटकों का आवागमन भी बढ़ा है. हालांकि, डॉ. बडोला ने बढ़ते पर्यटन को टिकाऊ और निर्धारित स्वरूप में बनाए रखना बड़ी चुनौती बताया.

पर्यटकों की बढ़ती संख्या से कूड़ा प्रबंधन बनी चुनौती: पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण कूड़ा प्रबंधन भी महत्वपूर्ण चुनौती बनकर सामने आया है. इसके अलावा बाघों का घनत्व बढ़ने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को नियंत्रित करना भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि कॉर्बेट प्रशासन स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर बाघ संरक्षण और सुरक्षा के साथ नई आजीविका के अवसर बढ़ाने पर लगातार काम कर रहा है. ताकि, बाघों की बढ़ती संख्या से होने वाले लाभ स्थानीय ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों तक भी पहुंच सकें.

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