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आस्था, तप, संयम का महासंगम: पौराणिक काल से ड्रोन युग तक कितनी बदली कांवड़ यात्रा? जानें पैदल कांवड़ क्यों मानी जाती है श्रेष्ठ

Uk Fast Khabar August 4, 2026

आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा को लेकर क्या नियम हैं और सबसे पहले किसने कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी. रिपोर्ट- किरणकांत शर्मा

देहरादून: सावन का महीना शुरू होते ही उत्तर भारत की सड़कों का रंग बदल जाता है. भगवा वस्त्रों में लाखों शिव भक्त, कंधों पर सजी-धजी कांवड़, हाथों में भगवा ध्वज और बोल बम हर-हर महादेव के जयकारें के साथ कई सौ किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़ते हैं. लगभग 15 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में अकेले उत्तराखंड में ही 4 करोड़ से अधिक भक्त गंगाजल लेने पहुंचते हैं. यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सनातन, संस्कृति, अनुशासन, तप, सेवा और सामूहिक आस्था का ऐसा विराट पर्व है, जिसकी मिसाल दुनिया में कम ही देखने को मिलती है.

हम इसको दुनिया की सबसे बड़ी पद यात्रा भी कह सकते हैं. हर साल करोड़ों श्रद्धालु हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री और गौमुख जैसे पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि-

  1. आखिर कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई?
  2. इसकी धार्मिक कथा क्या है?
  3. कांवड़ कितने प्रकार की होती है ?
  4. हरिद्वार और ऋषिकेश ही इस यात्रा के सबसे बड़े केंद्र क्यों बन गए?

इन सबके बार में आज ईटीवी भारत आपको विस्तार से बताएगा.

पुराणों में छिपी है कांवड़ यात्रा की मूल कथा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की जड़ें समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी मानी जाती हैं. जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला तो समस्त सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान किया. विष की तीव्रता से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे अत्यधिक ताप से परेशान हो उठे. तब देवताओं ने विभिन्न पवित्र नदियों का जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया, जिससे उन्हें शीतलता मिली. माना जाता है कि तभी से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई.

गंगाजल से अभिषेक करने वाले पहले शिव भक्त भगवान परशुराम: धर्म के जानकार मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम पहले ऐसे शिवभक्त थे जिन्होंने गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया.

कई धर्म ग्रंथों में रावण द्वारा भी गंगाजल लाकर शिव पूजन करने का उल्लेख मिलता है. समय के साथ यह परंपरा जन आस्था का विराट रूप धारण करती चली गई और यही कारण रहा कि भगवान शिव को मनाने के लिए आज ये यात्रा एक बड़ा स्वरूप ले चुकी है. सावन का महीना वैसे भी भगवान शिव को बेहद पसंद है. इसलिए इस महीने मे भगवान को जल चढ़ाने का महत्व भी बेहद अधिक है.
– मनोज त्रिपाठी, धार्मिक जानकार –

इतिहास के पन्नों में भी मिलते हैं कांवड़ यात्रा के प्रमाण: धर्माचार्य प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार, कांवड़ यात्रा केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं.

मध्यकालीन यात्रा वृत्तांतों और स्थानीय लोक परंपराओं में शिवभक्तों द्वारा गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने का उल्लेख मिलता है. हालांकि, उस समय यात्रा का स्वरूप सीमित था और श्रद्धालुओं की संख्या भी कम होती थी. पिछले चार-पांच दशकों में सड़क परिवहन, सामाजिक संगठनों और सेवा शिविरों के विस्तार के साथ कांवड़ यात्रा ने अभूतपूर्व जनआंदोलन का रूप ले लिया. आज यह दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक पद यात्राओं में गिनी जाती है. इसके स्वरूप में भी बदलाव हुए है.
– प्रतीक मिश्रपुरी, धर्माचार्य –

आखिर क्या होती है कांवड़: दरअसल कांवड़ बांस या लकड़ी से बनी वह संतुलित संरचना होती है, जिसे श्रद्धालु अपने दोनों कंधों पर रखते हैं. इसके दोनों सिरों पर गंगाजल से भरे कलश या पात्र बांधे जाते हैं. पूरी यात्रा के दौरान श्रद्धालु इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हुए उसकी शुद्धता बनाए रखते हैं.मान्यता है कि जिस जल को गंगा से भर लिया गया, उसे बिना किसी अपवित्रता के सीधे शिवलिंग पर ही अर्पित किया जाना चाहिए. यही कारण है कि कांवड़ को भूमि पर रखने से बचा जाता है. इसके लिए विशेष स्टैंड का उपयोग किया जाता है. आम लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होता है कि शिव भक्त जब कावड़ लेकर जाएं तो पूरी कोशिश करें की उन्हे पहले आने जाने दें. कोशिश यह भी रहे कि किसी तरह का स्पर्श कांवड़ से कोई और न करे.

कितने प्रकार की होती है कांवड़ यात्रा: समय के साथ कांवड़ यात्रा कई स्वरूपों में विकसित हुई है.

  • सबसे सामान्य होती है साधारण कांवड़, जिसमें श्रद्धालु पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं.
  • दूसरी होती है डाक कांवड़, जिसमें शिवभक्त बिना रुके लगातार दौड़ते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं. यह सबसे कठिन यात्राओं में मानी जाती है और इसमें समय का विशेष महत्व होता है.
  • तीसरी है खड़ी कांवड़ जिसमें कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता और पूरी यात्रा के दौरान विशेष सावधानी बरती जाती है.
  • कुछ स्थानों पर वाहन कांवड़ भी देखने को मिलती है. उत्तराखंड में भी जिसका चलन हाल के सालों मे बेहद या कहें सबसे अधिक देखने के लिए मिला है, जिसमें श्रद्धालु यात्रा का कुछ हिस्सा वाहन से करते हैं.

धर्माचार्य प्रतीक मिश्रपुरी कहते हैं कि ग्रंथों मे पैदल कांवड़ का ही महत्व माना गया है. धार्मिक दृष्टि से पैदल कांवड़ को अधिक पुण्यदायी होती है.

हरिद्वार और ऋषिकेश ही क्यों हैं सबसे बड़ी आस्था के केंद्र: कांवड़ यात्रा का नाम आते ही सबसे पहले हरिद्वार और ऋषिकेश का की आंखों से सामने आती है. प्रतीक मिश्रपुरी कहते है कि,

इसकी सबसे बड़ी वजह गंगा का धार्मिक महत्व है. हरिद्वार वह स्थान माना जाता है जहां गंगा पर्वतों से निकलकर पहली बार मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है. हरकी पैड़ी का गंगाजल विशेष रूप से पवित्र माना जाता है.
– प्रतीक मिश्रपुरी, धर्माचार्य –

दूसरी ओर ऋषिकेश को तप योग और ऋषियों के साधना की भूमि कहा जाता है. यहां की निर्मल और तीव्र प्रवाह वाली गंगा को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना गया है, उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों से हरिद्वार और ऋषिकेश की सड़क संपर्क व्यवस्था भी बेहतर है, जिससे लाखों श्रद्धालुओं के लिए यहां पहुंचना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है.

भगवान को किसी भी पवित्र नदी का जल चढ़ाया जा सकता है, लेकिन हरिद्वार-ऋषिकेश धार्मिक रूप से बेहद पवित्र है. इसलिए भक्तों की कोशिश यही रहती है कि वो हरिद्वार से गंगा जल लेकर भगवान शिव को अर्पित करें.
– प्रतीक मिश्रपुरी, धर्माचार्य –

गंगा के जल का धार्मिक महत्व क्या है: कई लोगों के मन मे ये सवाल भी होते हैं कि भगवान शिव के अभिषेक में गंगा जल को इतना महत्व क्यों हैं? इसके पीछे की वजह है कि सनातन परंपरा.

सनातन परंपरा में गंगाजल को मोक्षदायिनी और पवित्रता का प्रतीक माना गया है. गंगाजल केवल जल नहीं बल्कि श्रद्धा, शुद्धता और दिव्यता का प्रतीक है. सावन में भगवान शिव पर गंगाजल चढ़ाने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं. मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है. यही कारण है कि श्रद्धालु कई सौ किलोमीटर की कठिन यात्रा केवल गंगाजल प्राप्त करने के लिए करते हैं.
– प्रतीक मिश्रपुरी, धर्माचार्य –

आधुनिक दौर में बदलता स्वरूप: बीते वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हुआ है. अब बड़ी संख्या में युवा भी इस यात्रा से जुड़ रहे हैं. प्रशासन डिजिटल निगरानी, ड्रोन कैमरे, सीसीटीवी, ट्रैफिक प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से यात्रा को सुरक्षित बनाने का प्रयास करता है.

वहीं धर्माचार्य लगातार यह संदेश देते हैं कि कांवड़ यात्रा का मूल उद्देश्य तप, संयम, अनुशासन और भक्ति है. इसलिए श्रद्धालुओं को यात्रा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए. हालांकि कुछ एक घटना के बाद अब इस यात्रा पर प्रशासन पुलिस की नजर भी रहती है. सरकारें अब बड़े आयोजन की तरह ही इस यात्रा की व्यवस्था भी महीनों पहले से करने लग जाती है.

धर्माचार्य क्या कहते हैं:

कांवड़ यात्रा केवल जल लाने की यात्रा नहीं बल्कि खुद के भीतर स्थित अहंकार, क्रोध और विकारों को त्यागने का साधन है. गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करने का अर्थ प्रकृति, जल और जीवन के प्रति श्रद्धा प्रकट करना भी है. हरिद्वार और ऋषिकेश से लाया गया गंगाजल इसलिए विशेष माना जाता है. क्योंकि यह हिमालय की गोद से निकलने वाली गंगा की निर्मल धारा का प्रतीक है, जिसे सनातन परंपरा में दिव्य और मोक्षदायिनी माना गया है.
-महंत रविंद्र पुरी, अध्यक्ष, अखाड़ा परिषद-

उत्तराखंड पुलिस के मुताबिक अभी यानी तीन अगस्त तक करीब 82 लाख से ज्यादा कांवड़िए हरिद्वार पहुंच चुके हैं. वहीं अनुमान के मुताबिक इस बार कांवड़ में करीब चार कांवड़ियों के पहुंचने की उम्मीद है.

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