Skip to content
UK Fast Khabar

UK Fast Khabar

Connect with Us

  • Facebook
  • Twitter
  • Linkedin
  • VK
  • Youtube
  • Instagram

Categories

  • Biography
  • BJP
  • blog
  • Business
  • CONGRESS
  • crime
  • Dehardun
  • Economy
  • employment
  • Model
  • National
  • New tehri
  • News
  • Newsbeat
  • Politics
  • Stories
  • Tech
  • Uncategorized
  • World
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अपराध
  • अल्मोड़ा
  • आपका शहर
  • आपदा
  • इतिहास
  • उत्तर प्रदेश
  • उत्तरकाशी
  • उत्तरराखंड विधानसभा
  • उत्तराखंड
  • उत्तराखण्ड
  • ऊधम सिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • क्राइम
  • खबर हटकर
  • खेल
  • गैरसैण
  • चमोली
  • चम्पावत
  • चलो चले देवभूमि
  • चारधाम
  • चारधाम यात्रा
  • जम्मू-कश्मीर
  • टिहरी
  • टेक्नॉलॉजी
  • ट्रेंडिंग खबरें
  • ताज़ा ख़बर
  • ताज़ा ख़बरें
  • दिल्ली
  • दुर्घटना
  • देश
  • देश-विदेश
  • देहरादून
  • देहरादून/मसूरी
  • धर्म-संस्कृति
  • धामी सरकार
  • नई दिल्ली
  • नैनीताल
  • न्यूज़
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पुलिस
  • बाजार
  • बिहार
  • भारत
  • मनोरंजन
  • मसूरी
  • मुंबई
  • मौसम
  • राजधानी दिल्ली
  • राजनीति
  • रुड़की
  • रुद्रपुर
  • रुद्रप्रयाग
  • वर्ल्ड न्यूज़
  • विदेश
  • व्यापार
  • शिक्षा
  • शिक्षा/रोजगार
  • श्रीनगर
  • सेना
  • सोशल मीडिया वायरल
  • स्वास्थ्य
  • हरिद्वार
  • हल्द्वानी
Primary Menu
  • Home
  • उत्तराखंड
  • देहरादून/मसूरी
  • भारत
  • विदेश
  • राजधानी दिल्ली
  • राजनीति
  • सोशल मीडिया वायरल
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • खेल
  • News
Live

उत्तराखंड पर भी नेपाल जैसी तबाही का खतरा! जानिए हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों की मॉनिटरिंग पर कितना अलर्ट सिस्टम

Uk Fast Khabar August 31, 2026

नेपाल आपदा से सवाल उठ रहा है कि ऐसी त्रासदी की चेतावनी देने और जनहानि बचाने के लिए उत्तराखंड कितना तैयार है? रिपोर्ट- धीरज सजवाण

देहरादून: नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण आपदा ने एक बार फिर हिमालयी राज्यों की आपदा तैयारियों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. घटना का स्वरूप भले ही बड़ा हो, लेकिन इस तरह की आपदाएं उत्तराखंड के लिए नई नहीं हैं. 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की तपोवन-रैणी आपदा और इसके बाद जोशीमठ, धराली समेत अलग-अलग हिस्सों में सामने आई आपदाओं ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड का हिमालयी भूभाग बेहद संवेदनशील है. ऐसे में नेपाल की घटना को सिर्फ पड़ोसी देश की त्रासदी के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा.

असल सवाल यह है कि अगर इसी तरह की कोई बड़ी आपदा उत्तराखंड में आती है तो क्या उसके आने से पहले लोगों को चेतावनी मिल पाएगी? क्या ग्लेशियर, ग्लेशियर झील, नदी के स्रोत और ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी गतिविधियों की निगरानी के लिए पर्याप्त सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम मौजूद हैं? और अगर कोई घटना अचानक घटती है तो उसके बाद डाउनस्ट्रीम इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के लिए सिस्टम कितना प्रभावी है?

नैपाल जैसी घटना के उत्तराखंड में 2 ताजा उदाहरण: हिमालयी भूगोल को समझने वाले विशेषज्ञों की मानें तो उत्तराखंड और नेपाल के हिमालयी हिस्से में कई भौगोलिक समानताएं हैं. दोनों ही क्षेत्र युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं, जहां ग्लेशियर, मोरेन, खड़ी चट्टानें, भूस्खलन, नदियां और मानसूनी गतिविधियां आपस में मिलकर आपदा के जोखिम को बढ़ाती हैं.

वरिष्ठ ग्लेशियर वैज्ञानिक और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल के मुताबिक,

उत्तराखंड के सामने ऐसी घटनाओं के दो बड़े ताजा उदाहरण मौजूद हैं. पहली 2013 की केदारनाथ आपदा और दूसरा 2021 की तपोवन-रैणी घटना. हालांकि हर घाटी की अपनी अलग विशेषता होती है. किसी घाटी में ग्लेशियर ज्यादा हैं, कहीं खड़ी चट्टानें ज्यादा हैं और कहीं पुराने मोरेन मौजूद हैं. ऐसे में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी हर घाटी पर उसके स्थानीय भूगोल और संरचना के अनुसार अलग-अलग पड़ता है.
-डॉ डीपी डोभाल, ग्लेशियर वैज्ञानिक-

डॉ. डोभाल की बात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ग्लेशियर झीलों को लेकर है. उनके मुताबिक, उत्तराखंड में उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड खंगालने पर बहुत पुरानी GLOF यानी ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड की घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता. 18वीं शताब्दी की बेलाकुची बाढ़ का जिक्र जरूर मिलता है, लेकिन वह ग्लेशियर झील टूटने से नहीं बल्कि भूस्खलन के कारण नदी का रास्ता बाधित होने के बाद बनी स्थिति से जुड़ी थी. वहीं 2013 की केदारनाथ घटना को ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड के संदर्भ में महत्वपूर्ण घटनाओं में माना गया. इसी घटना के बाद उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में मौजूद झीलों की बड़े स्तर पर मैपिंग की गई. इस मैपिंग में प्रदेश के हिमालयी क्षेत्र में अलग-अलग प्रकृति की करीब 1200 झीलों को चिन्हित किया गया. इनमें सुपर ग्लेशियर लेक, मोरेन डेम लेक, आर्टिफिशियल लेक और रॉक-स्टेबल लेक जैसी अलग-अलग श्रेणियां शामिल थीं. इनमें करीब 900 झीलें ऐसी अस्थायी सुपर ग्लेशियर झीलें थीं, जो ग्लेशियर की बर्फ के ऊपर बनती हैं और बाद में पिघल जाती हैं.

ऐसी झीलों को अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला माना जाता है. इसके विपरीत करीब 100 से कम मोरेन डेम झीलें ऐसी थीं, जिन्हें अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया, क्योंकि इनके प्राकृतिक बांध के टूटने की स्थिति में अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों की ओर आ सकता है.
-डॉ डीपी डोभाल, ग्लेशियर वैज्ञानिक-

यहीं से उत्तराखंड के सामने मौजूद असली चुनौती सामने आती है. डॉ. डोभाल के मुताबिक, बाद में किए गए एक सरकारी सर्वे में छह ऐसी ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गईं, जिन्हें सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया. इन झीलों पर बारीकी से अध्ययन और लगातार निगरानी की जरूरत है, लेकिन उनका कहना है कि,

अब तक इन पर उस स्तर का काम नहीं हुआ है जिसकी जरूरत है. यानी हमारे पास संभावित खतरे की पहचान तो है, लेकिन उस खतरे को लगातार मॉनिटर करने और खतरे के समय नीचे रहने वाली आबादी को तत्काल चेतावनी देने वाला मजबूत सिस्टम अभी पूरी तरह जमीन पर नहीं है. यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर हो जाती है क्योंकि, उत्तराखंड मध्य हिमालय के उस संक्रमण क्षेत्र में आता है, जहां भारतीय मॉनसून और वेस्टर्न डिस्टर्बेंस दोनों की महत्वपूर्ण गतिविधियां देखने को मिलती हैं. मौसम में तेजी से बदलाव, भारी बारिश, तापमान में उतार-चढ़ाव, ग्लेशियरों का पीछे हटना, बर्फ के पिघलने और ऊपरी हिमालय में भूगर्भीय अस्थिरता जैसे कारक एक-दूसरे के साथ मिलकर जोखिम पैदा कर सकते हैं. यही वजह है कि नेपाल में होने वाली घटना को उत्तराखंड से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता.
-डॉ. डीपी डोभाल, ग्लेशियर वैज्ञानिक-

विशेषज्ञों के मुताबिक, खतरा हर घाटी में एक जैसा नहीं है, लेकिन खतरे की प्रकृति को समझने और उसके हिसाब से तैयारी करने की जरूरत, पूरे हिमालयी क्षेत्र में समान रूप से है.

ग्लेशियर झीलों की निगरानी से पहले मिल सकता है तबाही का संकेत?: डॉ. डीपी डोभाल के मुताबिक, हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों का विस्तृत अध्ययन, सिर्फ वैज्ञानिक जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे सीधे अर्ली वार्निंग सिस्टम से जोड़ा जाना चाहिए. उनका कहना है कि, अगर किसी झील के बेस, उसमें होने वाले लीकेज, पानी के स्तर, आसपास के भूभाग और झील में होने वाली गतिविधियों का लगातार अध्ययन किया जाए तो संभावित खतरे का पहले से आकलन किया जा सकता है. इसके लिए सेंसर लगाए जा सकते हैं और इन सेंसर से मिलने वाली जानकारी के आधार पर नीचे की घाटियों में रहने वाले लोगों को समय रहते अलर्ट किया जा सकता है.

हाई रिस्क वाली छह झीलों में से कम से कम किसी एक को मॉडल प्रोजेक्ट के तौर पर चुना जाना चाहिए. वहां व्यापक मॉनिटरिंग के साथ अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाए और देखा जाए कि अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में सेंसर, संचार व्यवस्था और अलर्ट सिस्टम किस तरह प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं. अगर यह मॉडल सफल रहता है तो इसे दूसरी हाई रिस्क झीलों तक बढ़ाया जा सकता है. लेकिन अभी सबसे बड़ी कमी यही है कि संभावित जोखिम वाली झीलों की पहचान होने के बावजूद उनके लिए ऐसा व्यापक और जमीन पर सक्रिय अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार नहीं हो पाया है.
-डॉ. डीपी डोभाल, ग्लेशियर वैज्ञानिक-

नदियों में बाढ़ की अर्ली वार्निंग ही एक मात्र जान बचाने का साधन: उत्तराखंड के सामने सिर्फ ग्लेशियर झीलों का खतरा नहीं है. वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट और एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के प्रमुख एवं उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के पूर्व निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट के मुताबिक,

उत्तराखंड और नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियां काफी हद तक समान हैं और दोनों क्षेत्रों का आपदाओं से पुराना रिश्ता है. 1970 की अलकनंदा बाढ़ से लेकर 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की रैणी-तपोवन घटना, जोशीमठ और धराली जैसी घटनाओं ने यह साबित किया है कि ऊपरी हिमालय में होने वाली गतिविधियों का प्रभाव नीचे बसे इलाकों तक बेहद तेजी से पहुंच सकता है. उत्तराखंड में हर बड़ी आपदा के बाद वैज्ञानिक समुदाय ने अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत उठाई है, लेकिन चुनौती यह है कि चेतावनी की बात अक्सर आपदा के बाद ज्यादा गंभीरता से सामने आती है.
-डॉ. एमपीएस बिष्ट, वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट-

उन्होंने बताया कि, जब वह उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के निदेशक थे, तब उन्होंने भारत सरकार के गृह सचिव के सामने भी रैणी जैसी घटना को लेकर प्रस्तुति दी थी. उनका सुझाव था कि नदियों में काम कर रही हाइड्रो पावर कंपनियों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि, उनके प्रोजेक्ट के अपस्ट्रीम और नदी के स्रोत वाले हिस्से में सेंसर लगाए जाएं. इसके अलावा प्रोजेक्ट और डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में भी सेंसर लगाए जाएं, ताकि नदी के किसी भी हिस्से में असामान्य गतिविधि होने पर उसका पता तुरंत चल सके. इस व्यवस्था का मकसद सिर्फ घटना को रोकना नहीं, बल्कि लोगों को बचने का समय देना है. अगर नदी के स्रोत के पास ग्लेशियर टूटने, अचानक पानी बढ़ने, भूस्खलन होने या किसी अन्य असामान्य गतिविधि की जानकारी मिलती है और वह सूचना तत्काल डाउनस्ट्रीम तक पहुंचती है तो वहां मौजूद लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने का समय मिल सकता है.

रैणी जैसी घटना में अगर ऐसी व्यवस्था पहले से प्रभावी होती तो हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में काम कर रहे करीब 200 लोगों को बचने का मौका मिल सकता था. यानी आपदा प्रबंधन की असली कसौटी सिर्फ यह नहीं है कि घटना के बाद कितनी तेजी से रेस्क्यू किया गया. उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि घटना से पहले हमारे पास कितनी जानकारी थी और उस जानकारी को कितनी तेजी से खतरे वाले क्षेत्र में मौजूद लोगों तक पहुंचाया जा सका. हिमालयी इलाकों में सड़क, संचार और पहुंच की सीमाएं ऐसी हैं कि आपदा के बाद बचाव दल को घटनास्थल तक पहुंचने में समय लग सकता है. ऐसे में अर्ली वार्निंग का महत्व और बढ़ जाता है.
-डॉ. एमपीएस बिष्ट, वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट-

नदियों के किनारे बाढ़ क्षेत्र को भी चिन्हित करने की जरूरत: प्रो. एमपीएस बिष्ट का दूसरा महत्वपूर्ण सुझाव नदियों के किनारे बाढ़ क्षेत्र के वैज्ञानिक तरीके से चिह्नीकरण से जुड़ा है. उनका कहना है कि, उत्तराखंड के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब नदियों में आई बड़ी बाढ़ ने श्रीनगर जैसे शहरों तक को प्रभावित किया. इसके बावजूद नदी किनारे निर्माण और मानवीय गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं. उनके मुताबिक, नदी के किनारे रहने का मतलब यह भी है कि हम खुद को प्राकृतिक खतरे के करीब ले जा रहे हैं.

उनका सुझाव है कि, उत्तराखंड की प्रमुख नदियों के किनारे पिछली सबसे बड़ी बाढ़ के स्तर के वैज्ञानिक बेंचमार्क स्थापित किए जाने चाहिए. इन बेंचमार्क के आधार पर बाढ़ संभावित क्षेत्रों का निर्धारण हो और ऐसे क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए. इससे लोगों को पहले से पता होगा कि नदी का पानी किस स्तर तक पहुंच सकता है. अगर कोई व्यक्ति या संस्था इसके बावजूद उस निर्धारित जोखिम क्षेत्र में निर्माण करती है या वहां जाती है, तो कम से कम खतरे की जानकारी उसके पास पहले से होगी.

प्रोफेसर बिष्ट ने इसका उदाहरण अपने पिता के समय से जुड़ी एक घटना के जरिए दिया. उनके मुताबिक, जब उनके पिता श्रीनगर में एसएसबी में कार्यरत थे तो एसएसबी परिसर में 1970 की बाढ़ का स्तर दर्शाने वाला बेंचमार्क लगाया गया था. लेकिन बाद में इस स्तर को नजरअंदाज कर नई इमारत का निर्माण किया गया. करीब 250 करोड़ रुपs की लागत वाली यह इमारत बाढ़ के संभावित स्तर से नीचे बनाई गई और 2013 की आपदा में बुरी तरह क्षतिग्रस्त होकर ढह गई. यह उदाहरण बताता है कि सिर्फ खतरे की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है, उस जानकारी को निर्माण नीति और जमीन पर लागू नियमों से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है.

150 साल पहले की तैयारी आज के लिए सबक: प्रोफेसर बिष्ट ने उत्तराखंड के इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना का जिक्र करते हुए बताया कि, करीब डेढ़ सदी पहले भी तत्कालीन प्रशासन ने एक बड़े संभावित खतरे को पहचानकर अर्ली वार्निंग की व्यवस्था विकसित की थी. उनके मुताबिक, 1893 में अलकनंदा की सहायक नदी बिरही में गौणा क्षेत्र के पास भारी भूस्खलन से नदी का रास्ता बंद हो गया था और करीब 300 मीटर ऊंची झील जैसी स्थिति बन गई थी. उस समय अंग्रेज प्रशासन ने इस कृत्रिम झील के खतरे को गंभीरता से लिया और इसे धीरे-धीरे खाली करने की कोशिश की. इसके बावजूद जब झील में करीब 100 मीटर पानी बचा और उसके टूटने का खतरा बना रहा तो संभावित बाढ़ से निपटने के लिए हरिद्वार से लेकर झील वाले क्षेत्र तक करीब 250 किलोमीटर लंबी वायरलेस व्यवस्था तैयार की गई.

नदी के दोनों तरफ उस समय उपलब्ध सीमित तकनीक के जरिए चेतावनी व्यवस्था बनाई गई. बाद में जब झील टूटी तो भारी स्तर पर नुकसान हुआ और डाउनस्ट्रीम के करीब 250 किलोमीटर क्षेत्र में नदी के दोनों तरफ असर पड़ा, लेकिन प्रोफेसर बिष्ट के मुताबिक, इस घटना में सिर्फ एक व्यक्ति की मौत हुई और वह भी अपनी लापरवाही के कारण. उनके मुताबिक, इतने बड़े जलप्रलय में कम जनहानि के पीछे उस समय की तैयारी और चेतावनी व्यवस्था महत्वपूर्ण कारण थी. यह उदाहरण आज के दौर में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. डेढ़ सौ साल पहले जब तकनीक सीमित थी तब एक संभावित खतरे को पहचानकर सैकड़ों किलोमीटर तक चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था बनाई जा सकती थी तो आज सैटेलाइट, सेंसर, मोबाइल नेटवर्क, रियल टाइम डेटा, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल अलर्ट के दौर में इससे कहीं ज्यादा मजबूत व्यवस्था तैयार की जा सकती है. लेकिन सवाल यही है कि क्या हमने उपलब्ध तकनीक को उस स्तर पर आपदा चेतावनी से जोड़ा है?

सरकार का जवाब: इन सवालों पर उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग का अपना पक्ष है. आपदा प्रबंधन सचिव विनोद सुमन के मुताबिक,

उत्तराखंड और नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियों में समानता है और इसी वजह से इस प्रकार की घटनाओं की संभावना बनी रहती है. लेकिन राज्य सरकार लगातार आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर काम कर रही है. इसके तहत मॉक ड्रिल, जनजागरूकता अभियान और आपदा प्रबंधन से जुड़े मानव संसाधन को प्रशिक्षण देने का काम किया जा रहा है. राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन योजना और सभी जिलों के लिए जिला आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार की गई हैं. आपदा से निपटने के लिए आधुनिक उपकरणों की खरीद और उनके इस्तेमाल को लेकर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. यानी सरकार का फोकस सिर्फ आपदा के बाद राहत और बचाव पर नहीं, बल्कि आपदा से पहले तैयारी और मानव संसाधन की क्षमता बढ़ाने पर भी है.
-विनोद कुमार सुमन, सचिव, आपदा प्रबंधन-

अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर सचिव विनोद कुमार सुमन ने मौसम संबंधी चेतावनी के लिए सचेत ऐप का उल्लेख किया. वहीं भूकंप की चेतावनी को लेकर भू-देव ऐप के माध्यम से चेतावनी देने वाले मॉडल पर भी काम का दावा किया गया है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की अर्ली वार्निंग को लेकर है. इस मामले में आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि, इस दिशा में काम किया जा रहा है और यह व्यवस्था अगले चरण में विकसित की जानी है.

हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों पर वाडिया का अध्ययन, लेकिन सेंसर का इंतजार: हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों के अध्ययन की जिम्मेदारी वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को दी गई है. संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत के मुताबिक, हाई रिस्क के तौर पर चिन्हित पांच झीलों को लेकर अध्ययन पर चर्चा हुई है और कुछ-कुछ अध्ययन इन झीलों में किए भी गए हैं. हालांकि इन अध्ययनों की विस्तृत जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है. उनका कहना है कि, अलग-अलग स्थानों पर कुछ न कुछ काम किया गया है. लेकिन जब सवाल यह आता है कि क्या इन हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों में प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम और सेंसर लगाए जा चुके हैं, तो स्थिति अभी स्पष्ट रूप से पूरी नहीं हुई है. वाडिया निदेशक के मुताबिक,

यह महत्वपूर्ण काम अभी बाकी है. इसका कारण सिर्फ तकनीकी इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सिस्टम स्थापित करने की व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती संचार व्यवस्था की है. ऐसे ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में सेंसर से मिली सूचना को तुरंत नीचे तक पहुंचाना आसान नहीं है. सैटेलाइट कम्युनिकेशन एक विकल्प हो सकता है, लेकिन उसकी लागत अधिक है. इसके अलावा अत्यधिक ठंड, मौसम, तापमान और बिजली की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है. सेंसर लगाने के बाद उन्हें लगातार ऊर्जा उपलब्ध कराना और लंबे समय तक चालू रखना, अपने आप में तकनीकी चुनौती है. यही वजह है कि हाई रिस्क झीलों का अध्ययन तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन उनसे जुड़े प्रभावी रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम को जमीन पर उतारना अभी बाकी है.
-विनीत गहलोत, डायरेक्टर, वाडिया-

यही वह बिंदु है, जहां नेपाल की घटना उत्तराखंड के लिए एक गंभीर सबक बन जाती है. उत्तराखंड जैसे राज्य में यह व्यवस्था एक बहुस्तरीय मॉडल के रूप में विकसित की जा सकती है. सैटेलाइट आधारित संचार, सेंसर नेटवर्क, सायरन सिस्टम, मोबाइल अलर्ट, स्थानीय प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ, ग्राम स्तर की आपदा समितियां और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की अपनी निगरानी प्रणालियां एक-दूसरे से जुड़ी हों. अगर किसी ऊपरी क्षेत्र में असामान्य गतिविधि दर्ज होती है तो उसका अलर्ट सिर्फ किसी कंट्रोल रूम तक सीमित न रहे, बल्कि कुछ ही समय में संभावित प्रभावित घाटियों तक पहुंचना चाहिए. यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय लोगों की भूमिका का है.

आपदा वाले इलाकों के लोगों के लिए जरूरी क्या: हिमालयी क्षेत्रों में कई बार स्थानीय लोग मौसम, नदी के व्यवहार और पहाड़ों में होने वाले छोटे बदलावों को सबसे पहले महसूस करते हैं. ऐसे में तकनीकी सिस्टम के साथ स्थानीय स्तर की निगरानी और जनजागरूकता भी जरूरी है. मॉक ड्रिल का उद्देश्य भी सिर्फ सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि उन गांवों और कस्बों के लोगों को यह सिखाना होना चाहिए कि खतरे का अलर्ट मिलने के बाद उन्हें किस दिशा में जाना है, सुरक्षित स्थान कहां है और किस माध्यम से सूचना की पुष्टि करनी है.

कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि उत्तराखंड, नेपाल से अलग किसी जोखिम-मुक्त क्षेत्र में नहीं है. भौगोलिक समानता और हिमालयी परिस्थितियां यहां भी अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरों की संभावना बनाए रखती हैं. लेकिन खतरा होने का मतलब यह नहीं कि हर घटना नेपाल जैसी त्रासदी में बदलनी ही है. आपदा का असर कितना होगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि खतरे की पहचान कितनी जल्दी होती है, चेतावनी कितनी तेजी से नीचे पहुंचती है, लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने का कितना समय मिलता है और प्रशासन के पास बचाव के लिए कितनी तैयारी है.

अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी: उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के स्तर पर योजनाएं, प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल, आधुनिक उपकरण और कुछ क्षेत्रों के लिए चेतावनी प्रणालियां मौजूद हैं. लेकिन ग्लेशियर झीलों जैसे अत्यधिक संवेदनशील और दुर्गम स्रोत क्षेत्रों के मामले में अभी सबसे बड़ी जरूरत रियल टाइम मॉनिटरिंग और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम की है. वैज्ञानिकों की ओर से हाई रिस्क झीलों की पहचान और उनके अध्ययन की जरूरत लगातार बताई जा रही है, जबकि जिम्मेदार संस्थाएं भी यह स्वीकार कर रही हैं कि इन क्षेत्रों में चेतावनी प्रणाली विकसित करना अभी बाकी है.

इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम अगली बड़ी आपदा का इंतजार करेंगे या पिछली आपदाओं से मिले सबक को अगली आपदा से पहले जमीन पर उतारेंगे? 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की रैणी-तपोवन घटना ने पहले ही दिखा दिया है कि ऊपरी हिमालय में होने वाली घटनाएं कुछ ही समय में नीचे बड़ी तबाही का रूप ले सकती है. इतिहास में 1893 की अलकनंदा घाटी की घटना यह भी बताती है कि सीमित तकनीक के दौर में भी संभावित खतरे को पहचानकर लोगों को चेतावनी देने की कोशिश की गई थी.

नेपाल आपदा से उत्तराखंड को सबक: आज उत्तराखंड के पास उससे कहीं बेहतर तकनीक है. सैटेलाइट से लेकर रिमोट सेंसिंग, सेंसर, डिजिटल कम्युनिकेशन और मोबाइल अलर्ट तक तमाम साधन उपलब्ध है. जरूरत सिर्फ इन्हें एक समग्र आपदा चेतावनी नेटवर्क में बदलने की है. क्योंकि हिमालय में हर आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिकों की निगरानी, आधुनिक तकनीक, मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम और समय पर निकासी के जरिए उसकी कीमत जरूर कम की जा सकती है. नेपाल की त्रासदी का उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा सबक भी यही है. आपदा आने के बाद की तैयारी जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है आपदा आने से पहले खतरे को पहचानना और लोगों तक चेतावनी पहुंचाना.

Continue Reading

Previous: उत्तराखंड में बारिश का अलर्ट, आज इन जिलों में बंद रहेंगे स्कूल, क्लिक कर जानिए
Next: उत्तराखंड में पेड़ पर बैठा दिखा तेंदुआ, ग्रामीणों में दहशत, वन विभाग ने बढ़ाई गश्त

Related Stories

बिना तलाक दिए पति पर दूसरी शादी करने का आरोप, पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज

बिना तलाक दिए पति पर दूसरी शादी करने का आरोप, पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज

August 31, 2026
पुरानी पेंशन बहाली को लेकर गरजे कर्मचारी, 13 सितंबरको सीएम आवास कूच का किया एलान

पुरानी पेंशन बहाली को लेकर गरजे कर्मचारी, 13 सितंबरको सीएम आवास कूच का किया एलान

August 31, 2026
हरिद्वार: बारिश के चलते रेलवे स्टेशन के बाहर गिरा विशालकाय पेड़, रेलवे फाटक क्षतिग्रस्त होने से लगा जाम

हरिद्वार: बारिश के चलते रेलवे स्टेशन के बाहर गिरा विशालकाय पेड़, रेलवे फाटक क्षतिग्रस्त होने से लगा जाम

August 31, 2026
https://youtu.be/mr6MrumB0_k

Connect with Us

  • Facebook
  • Twitter
  • Linkedin
  • VK
  • Youtube
  • Instagram

You may have missed

बिना तलाक दिए पति पर दूसरी शादी करने का आरोप, पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज

बिना तलाक दिए पति पर दूसरी शादी करने का आरोप, पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज

August 31, 2026
पुरानी पेंशन बहाली को लेकर गरजे कर्मचारी, 13 सितंबरको सीएम आवास कूच का किया एलान

पुरानी पेंशन बहाली को लेकर गरजे कर्मचारी, 13 सितंबरको सीएम आवास कूच का किया एलान

August 31, 2026
हरिद्वार: बारिश के चलते रेलवे स्टेशन के बाहर गिरा विशालकाय पेड़, रेलवे फाटक क्षतिग्रस्त होने से लगा जाम

हरिद्वार: बारिश के चलते रेलवे स्टेशन के बाहर गिरा विशालकाय पेड़, रेलवे फाटक क्षतिग्रस्त होने से लगा जाम

August 31, 2026
अमेरिका में तिरंगे के अपमान पर रिजिजू की खालिस्तानियों को कड़ी चेतावनी, ये तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा

अमेरिका में तिरंगे के अपमान पर रिजिजू की खालिस्तानियों को कड़ी चेतावनी, ये तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा

August 31, 2026

About Us

Founder – INDRA
Website – www.ukfastkhabar.com
Email – ukfastkhabar@gmail.com
Phone – +91-9917070725
Address –Naithani House, Lane No. 4 Devpuram Enclave, Badripur, Dehradun, 208005, Uk

Categories

BJP blog Dehardun National News Newsbeat Politics Tech World अपराध आपका शहर उत्तरकाशी उत्तराखंड ऋषिकेश क्राइम खबर हटकर खेल चारधाम चारधाम यात्रा टेक्नॉलॉजी ट्रेंडिंग खबरें ताज़ा ख़बर ताज़ा ख़बरें दिल्ली दुर्घटना देश-विदेश देहरादून देहरादून/मसूरी धर्म-संस्कृति धामी सरकार नैनीताल न्यूज़ पर्यटन बाजार भारत मनोरंजन मौसम राजधानी दिल्ली राजनीति रुद्रपुर विदेश शिक्षा सोशल मीडिया वायरल स्वास्थ्य हरिद्वार

Recent Posts

  • बिना तलाक दिए पति पर दूसरी शादी करने का आरोप, पति और दूसरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज
  • पुरानी पेंशन बहाली को लेकर गरजे कर्मचारी, 13 सितंबरको सीएम आवास कूच का किया एलान
  • हरिद्वार: बारिश के चलते रेलवे स्टेशन के बाहर गिरा विशालकाय पेड़, रेलवे फाटक क्षतिग्रस्त होने से लगा जाम
  • अमेरिका में तिरंगे के अपमान पर रिजिजू की खालिस्तानियों को कड़ी चेतावनी, ये तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा
  • About Us
  • Contact Us
  • Privacy Policy
  • Disclaimer
  • Terms & Conditions
  • Facebook
  • Twitter
  • Linkedin
  • VK
  • Youtube
  • Instagram
Copyright ©Uk Fast Khabar 2023, Design & Develop by Manish Naithani (9084358715). All rights reserved. | MoreNews by AF themes.