देहरादून: उत्तराखंड में हर कोने-कोने में भगवान और कुछ आलौकिक शक्तियों की मौजूदगी माना जाता है. जिसे वजह से उत्तराखंड को देवभूमि का दर्जा मिला है. यहां हर जगह मंदिर मिल जाते हैं. जिनकी अपनी-अपनी मान्यताएं हैं. ऐसी ही कुछ मान्यताओं को समेटा हुआ एक मंदिर पौड़ी में भी मौजूद है. जिसे ताराकुंड महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर एक कुंड यानी झील के किनारे स्थित है. इस कुंड और मंदिर को लेकर भी अपनी मान्यताएं हैं. वहीं, अब ताराकुंड को पर्यटन के मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की तैयारी है.
दरअसल, पौड़ी के इस पौराणिक स्थल को धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में सरकार ने पहल तेज कर दी है. जिसके तहत खुद धामी सरकार के मंत्री धन सिंह रावत और सैकड़ों ग्रामीणों ने पदयात्रा कर ताराकुंड पहुंचे. जहां उन्होंने न केवल पूजा-अर्चना की. बल्कि, इस दौरान उन्होंने मां तारा का भव्य मंदिर निर्माण, झील का सौंदर्यीकरण एवं श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं को विकसित करने की बात कही. मंत्री धन सिंह ने भरोसा दिलाया कि इस पौराणिक स्थल को विकसित करने के लिए धन की कमी नहीं होने दी जाएगी.
2200 मीटर की ऊंचाई पर बसा है ताराकुंड झील और प्राचीन मंदिर: उत्तराखंड के पौड़ी जिले में समुद्र तल से करीब 2200 मीटर की ऊंचाई पर ताराकुंड नाम का एक खूबसूरत और शांत प्राकृतिक झील है. जहां प्राकृतिक रूप से बनी एक खूबसूरत ताल यानी कुंड या झील है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र है. ऊंचे पहाड़, हरियाली और जंगलों के बीच मौजूद छोटी झील और प्राचीन मंदिर इस स्थान की पहचान है.
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शहरों की भीड़भाड़ से दूर शांत वातावरण में स्थित ताराकुंड प्रकृति प्रेमियों, धार्मिक यात्रियों और पैदल भ्रमण करने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है. अभी तक बहुत कम लोग इस जगह को जानते हैं. हालांकि, अब जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी इस ताराकुंड के बारे में जानकारी साझा की जा रही है. वहीं, यहां तक पहुंचने के लिए पैदल रास्ते का सहारा लेना पड़ता है. जिससे यह स्थान अब तक बड़े पर्यटन केंद्रों की तरह विकसित नहीं हो पाया है.
वहीं, बेहतर सड़क संपर्क सुरक्षित पैदल मार्ग और बुनियादी सुविधाएं विकसित होने पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को सहूलियत मिल सकती है. ताराकुंड की यही प्राकृतिक खूबसूरती और धार्मिक पहचान इसे भविष्य के पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं पैदा कर रही है.
क्या है ताराकुंड झील और मंदिर की मान्यता?
कहां स्थित है ताराकुंड, कैसे पहुंच सकते हैं श्रद्धालु? ताराकुंड पौड़ी जिले के पैठाणी क्षेत्र में स्थित है. यहां पहुंचने के लिए पौड़ी से सड़क मार्ग के जरिए आना पड़ता है. पौड़ी से पदानी तक करीब 44 किलोमीटर सड़क यात्रा के बाद लगभग पांच किलोमीटर का पैदल ट्रेक तय करके ताराकुंड पहुंचा जा सकता है. एक अन्य मार्ग बड़ेथ गांव की ओर से भी जाता है. जबकि, पैठाणी के आसपास के क्षेत्र से होकर भी पैदल पहुंचने के रास्ते इस्तेमाल किए जाते हैं. पैदल लगभग 1 घंटे की ट्रेकिंग के बाद यहां पहुंचा जा सकता है.
नवरात्रि में धार्मिक पर्यटन से जुड़ सकती है ताराकुंड की पहचान: नवरात्रि के दौरान देशभर में देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है. उत्तराखंड में भी मां दुर्गा और शक्ति स्वरूपा देवी के अनेक मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है. ऐसे समय में ताराकुंड को धार्मिक पर्यटन से जोड़ने की पहल महत्वपूर्ण हो सकती है. वहीं, मां तारा के मंदिर और प्रतिमा का निर्माण होने, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं विकसित होने से इस स्थल को व्यापक पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है.
तीज पर जुटते हैं स्थानीय लोग: स्थानीय निवासी कुलदीप रावत कहते हैं कि यहां तीज के अवसर पर स्थानीय लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. शिवरात्रि के दौरान भी यहां भगवान शिव की पूजा करने भारी भीड़ उमड़ती है. ताराकुंड आसपास के गांवों के लोगों की आस्था और स्थानीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है. झील और मंदिर के आसपास का शांत वातावरण इस स्थल को आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए भी शानदार बनाता है.
यदि विकास योजनाओं के साथ इन परंपराओं का संरक्षण किया जाता है, तो ताराकुंड को केवल घूमने की जगह के बजाय स्थानीय संस्कृति और आस्था से जुड़े पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है. मंदिर का इतिहास स्थानीय लोककथाएं और धार्मिक आयोजनों से जुड़ी जानकारियां जुटाकर उन्हें पर्यटकों तक पहुंचाना अब सरकार का काम है. फिलहाल, सरकार भी इस ओर ध्यान दे रही है.
बुंखाल से धारी देवी तक धार्मिक स्थलों को जोड़ने की योजना: कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत ने ताराकुंड को धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन सर्किट से जोड़ने की दिशा में काम करने की बात कही है. प्रस्तावित सर्किट में बुंखाल मंदिर, पैठाणी स्थित राहु मंदिर, भैरवनाथ मंदिर, देवलगढ़ के राजराजेश्वरी देवी मंदिर, कमलेश्वर महादेव मंदिर और मां धारी देवी मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों को शामिल करने की पहल की जाएगी.
इन स्थलों की अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान है. इन्हें बेहतर रोड कनेक्टिविटी, यात्री सुविधाओं, सूचना संकेतकों और स्थानीय पर्यटन सेवाओं के माध्यम से आपस में जोड़ने से श्रद्धालुओं को एक ही यात्रा में कई धार्मिक स्थलों के दर्शन करने का अवसर मिल सकता है. इससे आस पास के गांवों में रोजगार, स्थानीय उत्पादों की बिक्री और होमस्टे जैसी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा.
“ताराकुंड हमारी अगाध आस्था, संस्कृति और समृद्ध धार्मिक विरासत का प्रतीक है. जिस प्रकार हमने पैठाणी स्थित ऐतिहासिक राहु मंदिर को सौंदर्यीकरण, बेहतर कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के विकास के माध्यम से वैश्विक पटल पर पहचान दिलाई है, जहां आज देश-विदेश से श्रद्धालु राहु दोष निवारण और दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं. ठीक उसी तरह हमारा यह संकल्प है कि हम ताराकुंड और आसपास के प्राकृतिक व धार्मिक स्थलों को भी इसी तर्ज पर विकसित करें.“- धन सिंह रावत, कैबिनेट मंत्री
“ताराकुंड को भव्य पर्यटन सर्किट से जोड़ने, बेहतर सड़क नेटवर्क का विस्तार करने और यहां आने वाले पर्यटकों व श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएं जुटाने का खाका तैयार किया जा रहा है. इस सबका मुख्य उद्देश्य केवल पर्यटन बढ़ाना ही नहीं, बल्कि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है. स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना और देवभूमि से होने वाले पलायन को रोककर अपनी संस्कृति को संजोना है.“- धन सिंह रावत, कैबिनेट मंत्री
ग्रामीणों ने रखीं विकास की मांगें, झील के सौंदर्यीकरण पर भी जोर: सरकार के मंत्री और अधिकारियों के ताराकुंड पहुंचने के बाद मंदिर परिसर में खुली चर्चा आयोजित की गई. जिसमें ग्रामीणों ने क्षेत्र के विकास से जुड़ी समस्याओं और सुझावों को सामने रखा. ग्रामीणों ने सड़क संपर्क को सुचारू बनाने, झील का सौंदर्यीकरण, विश्राम गृह और ध्यान केंद्र बनाने और श्रद्धालुओं के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित करने की मांग की. साथ ही सुरक्षित पैदल मार्ग, बैठने की व्यवस्था, पेयजल व्यवस्था करने की मांग भी रखी. जिस पर धन सिंह रावत ने सकारात्मक आश्वासन दिया है.
पर्यटन बढ़ा तो स्थानीय लोगों के लिए खुल सकते हैं रोजगार के रास्ते: ताराकुंड को पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने का लाभ केवल मंदिर और झील तक सीमित नहीं रहेगा. यदि यहां नियमित रूप से श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचने लगते हैं, तो स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, वाहन सेवा, होमस्टे, भोजनालय और स्थानीय उत्पादों की बिक्री जैसे रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन आधारित आजीविका को बढ़ावा देना पलायन की चुनौती से निपटने की दिशा में भी मददगार हो सकता है. इसके लिए जरूरी होगा कि विकास योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और पर्यटन गतिविधियों का लाभ आसपास के गांवों तक पहुंचे. अब विकास योजनाओं के धरातल पर उतरने का इंतजार है.