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बोर्ड परीक्षा के नतीजे पर अंकों की होड़ में न बिखरें, खुद पर रखें भरोसा, असफलता को बनाए हथियार

Uk Fast Khabar April 28, 2026

बोर्ड परीक्षाओं में कम अंक वाले छात्रों को डिप्रेशन का शिकार ना होना पड़े.ऐसे में छात्रों को असफलता से सफलता की सीख लेनी चाहिए.

देहरादून: उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा के नतीजे घोषित होने के बाद जहां एक ओर टॉपर्स की सफलता की कहानियां सुर्खियों में हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे छात्र भी हैं जो इस परीक्षा में असफल रहे हैं या अपनी उम्मीदों के अनुरूप अंक हासिल नहीं कर पाए. आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार हाई स्कूल में 8600 से अधिक छात्र असफल हुए हैं, जबकि इंटरमीडिएट में यह संख्या 14900 के पार पहुंच गई है. यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हजारों छात्रों और उनके परिवारों की उम्मीदों, दबावों और भावनाओं की कहानी भी बयां करते हैं.

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है गहरा असर: ऐसे समय में सबसे बड़ी जिम्मेदारी अभिभावकों की बन जाती है. परीक्षा में असफलता या कम अंक आने के बाद बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ सकता है. कई बार बच्चे खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं, आत्मविश्वास खो देते हैं और भविष्य को लेकर निराशा में डूब जाते हैं. यही वह मोड़ होता है, जहां अभिभावकों का व्यवहार बच्चे के जीवन की दिशा तय कर सकता है.

ऐसे छात्रों के लिए जितनी जिम्मेदारी शिक्षकों की होती है उतनी ही अभिभावकों की भी. कोशिश की जानी चाहिए कि ऐसे छात्र खुद को बाकी छात्रों से अलग या कमतर न समझे. इसी तरह अभिभावक को भी इन छात्रों के मोटिवेशन और उन्हें सही रहता दिखाने के लिए लगातार उनसे बातचीत करते रहना चाहिए.
-नरेंद्र खंडूड़ी, गणित शिक्षक-

अभिभावक करते हैं दूसरे बच्चों से तुलना: अक्सर देखा जाता है कि रिजल्ट आने के बाद अभिभावक अपने बच्चों की तुलना रिश्तेदारों या पड़ोस के बच्चों से करने लगते हैं. देखो उसके इतने नंबर आए और तुम्हारे इतने कम जैसे वाक्य बच्चों के मनोबल को और गिरा देते हैं. इसके बजाय अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की भावनाओं को समझें और उनके साथ संवाद स्थापित करें.

असफलता को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक सीख के रूप में देखने की जरूरत है. हर छात्र का सीखने का तरीका, उसकी क्षमता और रुचि अलग-अलग होती है. ऐसे में केवल अंकों के आधार पर किसी बच्चे की योग्यता को आंकना सही नहीं है. लेकिन समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और तुलना की प्रवृत्ति ने बच्चों पर अनावश्यक दबाव बढ़ा दिया है.
-सचिन्द्र नौटियाल, शिक्षक-

मानसिक दबाव से बाहर निकालने की करें कोशिश: बच्चों से खुलकर बातचीत करना इस समय सबसे जरूरी कदम है. उन्हें यह महसूस कराना कि उनकी असफलता से उनका मूल्य कम नहीं हो जाता, बल्कि यह एक अनुभव है जिससे वे सीख सकते हैं. अगर बच्चा अपनी बात खुलकर साझा कर पाए, तो वह मानसिक दबाव से बाहर निकल सकता है.

बच्चों की प्रतिभा को जानें: इसके साथ ही अभिभावकों को बच्चों की रुचि और क्षमता को पहचानने की भी जरूरत है. हर बच्चा पढ़ाई में अव्वल हो, यह जरूरी नहीं है. कई बच्चे खेल, संगीत, कला, तकनीकी कौशल या अन्य क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. आज के समय में करियर के विकल्प भी पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गए हैं. ऐसे में बच्चों को केवल पारंपरिक शिक्षा तक सीमित रखना उनके संभावनाओं को सीमित करना हो सकता है.

शिक्षाविद् क्या कहते हैं: शिक्षा विद देवेंद्र भसीन कहते हैं कि अगर बच्चे को उसकी रुचि के अनुसार मार्गदर्शन दिया जाए, तो वह उस क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकता है. उदाहरण के तौर पर जिन बच्चों की रुचि तकनीकी कार्यों में है, उन्हें स्किल बेस्ड कोर्स की ओर प्रेरित किया जा सकता है. वहीं जिन बच्चों को खेल या कला में रुचि है, उनके लिए भी आज बेहतर अवसर मौजूद हैं. इस पूरे परिदृश्य में एक और अहम पहलू बच्चों का आत्मविश्वास है. परीक्षा में असफल होने के बाद सबसे पहले यही चीज प्रभावित होती है. ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को मोटिवेट करें, उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करें और उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि वे आगे बेहतर कर सकते हैं.

सही दिशा दिखाने का प्रयास: स्कूलों और शिक्षकों की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है. कई स्कूल अब काउंसलिंग सत्र आयोजित कर रहे हैं, जहां असफल छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने और उन्हें सही दिशा दिखाने का प्रयास किया जाता है. यह पहल छात्रों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती है. हालांकि ऐसे छात्रों के लिए कंपार्टमेंट का भी विकल्प होता है जिसके लिए उत्तराखंड बोर्ड की तरफ से परीक्षा के माध्यम से छात्रों को फिर से मौका दिया जाता है. फिलहाल उत्तराखंड विद्यालई शिक्षा बोर्ड की तरफ से ऐसे छात्रों के लिए अलग से परीक्षा का आयोजन कराया जाना है.

तमाम विद्यालयों को ऐसे छात्रों पर भी विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए गए हैं जो सफल नहीं हो पाए हैं या फिर उम्मीद के अनुसार अंक प्राप्त नहीं कर पाए हैं.
-दीप्ति सिंह शिक्षा महानिदेशक-

सोच में बदलाव लाने की जरूरत: समाजसेवी सुरेंद्र कुमार खाते हैं कि समाज को भी अपनी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है. केवल टॉपर्स की सफलता को ही सफलता का पैमाना मानना सही नहीं है. हर बच्चे की अपनी एक अलग यात्रा होती है और उसकी सफलता का मापदंड भी अलग हो सकता है. अगर समाज बच्चों को उनके प्रयासों के आधार पर स्वीकार करे, तो वे बिना किसी डर और दबाव के आगे बढ़ सकते हैं.

ठोस कदम उठाने की जरूरत: सरकार और शिक्षा विभाग को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है. असफल छात्रों के लिए विशेष मार्गदर्शन कार्यक्रम, करियर काउंसलिंग और स्किल डेवलपमेंट योजनाएं शुरू की जा सकती हैं. इससे न केवल बच्चों को नई दिशा मिलेगी, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. यह समझना जरूरी है कि नंबर जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं, यह केवल एक पड़ाव है, जो आगे की दिशा तय करने में मदद करता है. अगर अभिभावक, शिक्षक और समाज मिलकर बच्चों को सकारात्मक माहौल दें, तो यही बच्चे भविष्य में बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं.

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