उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने प्रत्याशियों के चयन की चुनौती बढ़ने के आसार हैं.
देहरादून: उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती उभरती दिखाई दे रही है. पार्टी के लिए इस बार चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों का चयन करना आसान नहीं होगा. कांग्रेस के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले 2027 में लगभग हर विधानसभा सीट पर दावेदारी करने वालों की संख्या बढ़ सकती है. ऐसे में किसी एक नाम पर अंतिम मुहर लगाना और बाकी दावेदारों को साथ बनाए रखना पार्टी के लिए बड़ी परीक्षा होगी.
10 साल से सत्ता से बाहर, अब बढ़ी उम्मीदें: कांग्रेस के सामने दावेदारों की संख्या बढ़ने की संभावना के पीछे कई कारण हैं. उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले 10 साल से सत्ता से बाहर है. इस दौरान पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता लंबे समय से राजनीतिक अवसर का इंतजार कर रहे हैं. अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर उन्हें उम्मीद है कि सत्ता विरोधी माहौल का फायदा विपक्ष को मिल सकता है.दूसरी ओर प्रदेश की तमाम विधानसभा सीटों पर भाजपा के मौजूदा विधायकों को लेकर नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं. कांग्रेस से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगता है कि सरकार के खिलाफ असंतोष और स्थानीय स्तर पर विधायकों की चुनौतियां विपक्ष के लिए अवसर पैदा कर सकती हैं. इसी उम्मीद में कई नेता अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुट सकते हैं.
पुराने नेताओं के साथ नई पीढ़ी भी दावेदार: इस बार कांग्रेस के सामने चुनौती केवल पुराने नेताओं के बीच टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा की नहीं होगी. पार्टी में नई पीढ़ी के नेता भी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए अधिक उत्सुक दिखाई दे रहे हैं. लंबे समय से राजनीति कर रहे नेताओं के साथ नए चेहरे भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. इससे एक ही विधानसभा सीट पर दावेदारों की संख्या बढ़ने की संभावना है. पार्टी के लिए मुश्किल यह होगी कि पुराने नेताओं के अनुभव और उनके राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा, जबकि नए चेहरों को अवसर देने की मांग भी उठेगी. ऐसे में टिकट वितरण के दौरान क्षेत्रीय समीकरण, संगठन में सक्रियता, पिछले चुनावों का प्रदर्शन और जीतने की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा.
पिछले दो चुनाव के मुकाबले इस बार प्रत्याशियों की संख्या ज्यादा दिखाई दे रही है और पार्टी के अंदरूनी आकलन में यह बात निकलकर सामने आई है. जाहिर है कि इसके कारण पार्टी को स्क्रीनिंग कमेटी की घोषणा होने के बाद काफी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी और तमाम मजबूत दावेदारों में से किसी एक का नाम चुनना पार्टी हाई कमान के लिए मुश्किल होगा.
-शीशपाल बिष्ट, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस-
टिकट के बाद बगावत रोकना भी चुनौती: कांग्रेस के सामने असली परीक्षा प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद भी होगी. टिकट नहीं मिलने पर नाराज दावेदार निर्दलीय चुनाव लड़ने या दूसरे विकल्प तलाशने का फैसला कर सकते हैं. इससे पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के सामने मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.ऐसे में 2027 के चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौती केवल भाजपा के खिलाफ चुनावी मुकाबला करने की नहीं, बल्कि टिकट वितरण से पहले ही अपने नेताओं और दावेदारों के बीच सहमति बनाने की भी होगी. पार्टी कितनी प्रभावी ढंग से इस असंतोष को संभाल पाती है, इसका असर उसके चुनावी प्रबंधन पर पड़ सकता है.