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‘बेड़ू पाको बारामासा’ की पहली धुन और ग्रामोफोन का दौर, डिजिटाइज होगा उत्तराखंड के स्वर्णिम संगीत का इतिहास

Uk Fast Khabar September 16, 2026

विलुप्त हो चुके 46 ग्रामोफोन लोकगीतों को खोजकर डिजिटल रूप से संरक्षित कर रहा ‘दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र’, रिपोर्ट- धीरज सजवाण

देहरादून: ‘बेड़ू पाको बारोमासा, नारेणा काफल पाको चैता, मेरी छैला…’ यह लाइन सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान की सबसे बुलंद आवाज है. साल 1952 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों से लेकर देश के प्रतिष्ठित सैन्य आयोजनों और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पसंद तक, यह गीत हमेशा छाया रहा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस ‘बेड़ू पाको’ को सुनकर पूरा देश झूम उठा था, उसकी सबसे शुरुआती और मौलिक गूंज ग्रामोफोन रिकॉर्ड के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंची थी.

उस दौर में काले रंग की भारी भरकम ‘शेलैक डिस्क’ (Tawa Record) पर रिकॉर्ड किए गए ये गीत न केवल संगीत का माध्यम थे, बल्कि उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का जीवंत दस्तावेज थे. टेप रिकॉर्डर, कैसेट और बाद में सीडी डिजिटल क्रांति के आने के साथ ग्रामोफोन रिकॉर्ड बीते जमाने की बात हो गए. जो लोगों की पुरानी पेटियों या कबाड़खाने में गुम हो गए. अब उत्तराखंड के इसी संगीतमय इतिहास और लगभग विलुप्त हो चुके 46 ग्रामोफोन लोकगीतों को खोजकर ‘दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र’ ने डिजिटल रूप से संरक्षित करने की एक ऐतिहासिक पहल की है.

पिताजी के 7 दुर्लभ रिकॉर्ड और ‘बेड़ू पाको’ के मौलिक अंदाज की खोज: उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक ‘गढ़रत्न’ नरेंद्र सिंह नेगी इस पूरी परियोजना में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक और प्रत्यक्षदर्शी की भूमिका में रहे हैं. दून पुस्तकालय के इस प्रयास और ग्रामोफोन के दिनों को याद करते हुए नरेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि ग्रामोफोन का दौर संगीत के लिए सबसे शुद्ध और साधना का दौर था. नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने व्यक्तिगत संग्रह और पुरानी यादों को साझा करते हुए कहा कि,

  • उन्होंने बताया कि इन रिकॉर्ड्स में से दो नॉन-कमर्शियल (Non Commercial) थे, जिन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष रूप से तैयार कराया था. इनमें उत्तर प्रदेश सूचना विभाग ने मोहन उप्रेती और उनकी पार्टी का मशहूर कुमाऊंनी गाना ‘बेड़ू पाको बारामासा’ रिकॉर्ड किया था. साल 1950 और 60 के दशक का वो ‘बेड़ू पाको’ का ओरिजिनल अंदाज और उसकी रिकॉर्डिंग आज के रिमिक्स गानों से बिल्कुल अलग और अलौकिक है. नेगी दा ने आगे बताया कि,

    • 10 साल की मशक्कत, देशभर के कलेक्टर्स से संपर्क और 46 दुर्लभ गानों की वापसी: इस ऐतिहासिक खोज परियोजना के पीछे 10 सालों की अटूट मेहनत, गहन शोध और दीवानगी की कहानी छिपी है. दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के इस विशेष प्रोजेक्ट से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और रिसर्चर राजू गुसाईं ने इस पूरे सफर के अनुभव साझा किए. राजू गुसाईं ने बताया कि,

      “मैंने लगभग 10 साल पहले उत्तराखंड के लुप्त हो चुके ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को खोजने का काम शुरू किया था. उस वक्त मेरे पास सिर्फ एक धुन थी कि हमारी पिछली पीढ़ी के कलाकारों की आवाजें कहां गायब हो गईं?शुरुआत में मुझे निराशा हाथ लगी. क्योंकि, साल 1939 से 1979 के बीच रिकॉर्ड हुए ये तवा रिकॉर्ड आम घरों से लगभग गायब हो चुके थे.“- राजू गुसाईं, रिसर्चर एवं वरिष्ठ पत्रकार

      “मैंने देशभर के कई बड़े ग्रामोफोन कलेक्टर्स से संपर्क साधा. आखिरकार हरियाणा के फरीदाबाद से हमें एक ऐसे संग्रहकर्ता का सुराग मिला, जिनके पास कुमाऊंनी और गढ़वाली के कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद थे. इसी रिसर्च जर्नी के दौरान हमें मशहूर कुमाऊंनी गाने ‘बेड़ू पाको’ के दो अलग-अलग वर्जन हाथ लगे. हर वर्जन का अपना एक अलग अंदाज और सांगीतिक वजन है.“- राजू गुसाईं, रिसर्चर एवं वरिष्ठ पत्रकार

      “दशकों पुराने होने के कारण कई रिकॉर्ड्स पर स्क्रैच और बैकग्राउंड नॉइज (Noise) काफी ज्यादा थी. इसके लिए हमने ग्रामोफोन रेस्टोरेशन एक्सपर्ट मोलोय घोष (Moloy Ghosh) की तकनीकी मदद ली. उन्होंने इन रिकॉर्ड्स का डिजिटल रेस्टोरेशन (Digital Restoration) किया, जिससे गानों की असली मिठास और आवाज की स्पष्टता वापस लौट आई.“- राजू गुसाईं, रिसर्चर एवं वरिष्ठ पत्रकार

      वरिष्ठ पत्रकार और रिसर्चर राजू गुसाईं के मुताबिक, विभिन्न स्रोतों से कुल 21 फिजिकल शेलैक रिकॉर्ड्स प्राप्त हुए. इनमें से 7 रिकॉर्ड्स भारत की आजादी यानी साल 1947 से पहले के थे. जो साल 1939 से 1946 के बीच के हैं. जबकि, 14 रिकॉर्ड्स साल 1947 के बाद के हैं.

      संरक्षण ही नहीं, शोधार्थियों के लिए तैयार हो रही है विस्तृत रिपोर्ट: दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के पदाधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने इस परियोजना के उद्देश्य, सांस्कृतिक महत्व और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने ग्रामोफोन गानों को खोजने और सहजने को बड़ी उपलब्धि बताया.

      उन्होंने बताया कि गढ़वाल और कुमाऊं के लगभग लुप्त हो चुके 46 ग्रामोफोन गानों को खोजकर उन्हें डिजिटल करना दून लाइब्रेरी के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि और नैतिक जिम्मेदारी थी. यह कार्य दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के अध्यक्ष प्रो. बीके जोशी और निदेशक एन रवि शंकर के सानिध्य में पिछले कुछ समय से चल रहा है. चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि,

      चंद्रशेखर तिवारी ने इस खोज में मदद करने वाले अन्य सहयोगियों और संग्रहकर्ताओं का आभार जताते हुए कहा कि पिछली बार जब मीडिया में हमने अपनी इस पहल की जानकारी साझा की थी, तो हमें कई अन्य ग्रामोफोन कलेक्टर्स तक पहुंचने में मदद मिली. देहरादून में ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) राजेंद्र रावत के कलेक्शन से हमें पांच और रिकॉर्ड्स मिले.

      वहीं, फरीदाबाद (हरियाणा) के गोकुल नेगी ने हमारी लाइब्रेरी से संपर्क किया और बताया कि उनके पास उनके पिता स्वर्गीय चंद सिंह नेगी का एक दुर्लभ ग्रामोफोन कलेक्शन मौजूद है. उन्होंने सहर्ष ये रिकॉर्ड्स डिजिटलाइजेशन के लिए हमें सौंप दिए. इस तरह जनसहयोग और शोध के मेल से यह असंभव सा दिखने वाला काम संभव हो पाया.

      उत्तराखंड में ग्रामोफोन का सफर (1939 से 1979): उत्तराखंड के संगीत इतिहास में साल 1939 से 1979 का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. साल 1939 में पहली बार उत्तराखंडी लोकधुनों और गीतों को ग्रामोफोन डिस्क पर उकेरा गया था.

      यह वो समय था, जब पहाड़ की दुर्गम घाटियों से निकलकर लोक संगीत रिकॉर्डिंग स्टूडियोज तक पहुंचा था. दून लाइब्रेरी द्वारा सहेजे गए 46 गानों का यह संग्रह 40 साल के लंबे इतिहास को समेटे हुए हैं. इसमें गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार तीनों क्षेत्रों के सांस्कृतिक रंग देखने को मिलते हैं.

      इन 18 महान कलाकारों की आवाजें हुई सुरक्षित: इस प्रोजेक्ट के तहत जिन दिग्गज और गुमनाम कलाकारों के गानों को डिजिटल नवजीवन मिला है, उनमें शामिल हैं. मशहूर गढ़वाली लोक गायक जीत सिंह नेगी (जिन्होंने साल 1949 में ‘तू होली बीरा‘ और साल 1970 के दशक का मोहन उप्रेती का ‘बेड़ू पाको‘ दिया). इसके अलावा मोहन उप्रेती, विजय छेत्री, उमा शंकर सतीश, सुषमा चंदोला, वाचस्पति डंडरियाल, राज किशोर मिश्रा, बिजेंद्र लाल शाह शामिल हैं.

      सबसे ज्यादा रिकॉर्ड के साथ जीत सिंह नेगी तो वहीं जीत सिंह नेगी के साथ 6 गाने गाने वाली गोपी देवी, मोहिनी शर्मा, गोपाल बाबू गोस्वामी, इंदिरा बाई, राम प्यारी, केशव अनुरागी, नईमा खान, शकुंतला देवी और अन्य स्थानीय गायक हैं. इन गानों में ‘तू होली बीरा’ (1949), ‘बेड़ू पाको’ के विविध रूप, पारंपरिक होली, मांगल गीत, न्योली और जौनसारी लोक धुनें शामिल हैं.

      जब गांव की शादियों में मचती थी ग्रामोफोन की धूम: आज भले ही ब्लूटूथ स्पीकर और स्मार्टफोन पर एक क्लिक में लाखों गाने उपलब्ध हैं, लेकिन आजादी के पहले और 1950-60 के दशक में ग्रामोफोन प्लेयर (आमतौर पर सुई और हॉर्न वाला बाजा) रखना किसी बड़ी रईसी या कौतूहल से कम नहीं था.

      साल 1947 से पहले भारत में ग्रामोफोन प्लेयर और उसके 78 आरपीएम (RPM) रिकॉर्ड्स बेहद महंगे और दुर्लभ हुआ करते थे. ये मुख्य रूप से राजा-महाराजाओं, अंग्रेजों, सेना के अफसरों या बेहद संपन्न जमींदार परिवारों के पास ही हुआ करते थे.

      उस दौर में उत्तराखंड के किसी दूरस्थ गांवों में जब किसी शादी-ब्याह, नामकरण या मेले के अवसर पर कोई संपन्न परिवार अपने घर के आंगन में ग्रामोफोन बाजा बजाता था, तो उसे सुनने के लिए मीलों दूर से पूरा गांव उमड़ पड़ता था.

      पीतल के बड़े हॉर्न से निकलती हुई ‘तवे की आवाज’ लोगों के लिए किसी जादू जैसी होती थी. भारत की आजादी के बाद धीरे-धीरे ग्रामोफोन की पहुंच मध्यमवर्ग तक बढ़ी, लेकिन साल 1980 के दशक में ऑडियो कैसेट (Cassette Tape) आते ही यह ऐतिहासिक यंत्र इतिहास के पन्नों में सिमट गया.

      देश में ग्रामोफोन का इतिहास: हिज मास्टर्स वॉइस (HMV) से लेकर भारत की रिकॉर्डिंग क्रांति तक भारत में ग्रामोफोन और साउंड रिकॉर्डिंग का इतिहास बेहद दिलचस्प एवं औपनिवेशिक दौर से जुड़ा हुआ है. भारत में पहली रिकॉर्डिंग 1902 में पहली व्यावसायिक साउंड रिकॉर्डिंग 8 नवंबर 1902 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में हुई थी.

      ‘ग्रामोफोन कंपनी’ के साउंड इंजीनियर फ्रेड गाइसबर्ग भारत आए थे और उन्होंने कलकत्ता की प्रसिद्ध गायिका गौहर जान की आवाज में राग जोगिया की ख्याल शैली को पहली शेलैक डिस्क पर रिकॉर्ड किया था. कुत्ते और हॉर्न वाला निशान ‘His Master’s Voice’ (HMV) का मशहूर लोगो, जिसमें ‘निपर’ नाम का एक कुत्ता ग्रामोफोन के हॉर्न की तरफ कान लगाए बैठा है, उसने भारत ही नहीं पूरी दुनिया में संगीत की सबसे बड़ी पहचान बनाई.

      रिकॉर्डिंग कंपनियों का दौर: भारत में ग्रामोफोन संगीत के प्रसार में कई दिग्गज कंपनियों ने भूमिका निभाई. इनमें शामिल HMV, कोलंबिया, यंग इंडिया, जो स्वदेशी आंदोलन के दौरान भारतीय देशभक्ति गीतों के लिए प्रसिद्ध हुई. Inreco जो इंडियन रिकॉर्ड्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी रही, तो वहीं इसके अलावा Senola, Twin, Hindusthan Records, और Aero-phone जैसी कंपनीयों ने पहचान बनाई.

      उत्तराखंड जो कि उस समय उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा था. यहां के लोक संगीत को भी इन्हीं बड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्डिंग कंपनियों (जैसे HMV, Columbia, INRECO, Aero-phone, Star Hindustan Records) के माध्यम से रिकॉर्ड करके पूरे देश में वितरित किया जाता था.

      विलुप्ति की कगार से ‘डिजिटल अमरता’ तक: अगर दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र समय रहते इन 21 दुर्लभ शेलैक डिस्क को न खोजता और उन्हें डिजिटलाइज न करता, तो शायद आने वाली पीढ़ियां जीत सिंह नेगी, गोपी देवी, गोपाल बाबू गोस्वामी, मोहन उप्रेती, इंदिरा बाई और केशव अनुरागी जैसे दिग्गजों की असली और मौलिक आवाज कभी सुन ही नहीं पातीं.

      दशकों पुरानी घिस चुकी शेलैक डिस्क पर से जब धूल हटी और डिजिटल रेस्टोरेशन के बाद जब स्पीकर से साल 1939 और 1949 की वही सुरीली गूंज निकली, तो ऐसा लगा मानो वक्त ठहर गया हो. दून लाइब्रेरी का यह शोध कार्य और डिजिटल आर्काइव न केवल उत्तराखंड के संगीत प्रेमियों के लिए एक नायाब तोहफा है. बल्कि, भारत के लोक-सांस्कृतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है.

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