पुष्कर सिंह धामी सरकार ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) लागू करने का संकल्प लिया है। मंत्रिमंडल की गुरुवार को पहली बैठक में मुख्यमंत्री की चुनाव पूर्व की गई इस घोषणा को मूर्त रूप देने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान में मिले अधिकार का उपयोग करते हुए सरकार यह कदम उठा रही है।
समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए शीघ्र उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की समिति गठित की जाएगी। इसमें विधि विशेषज्ञों व सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय प्रबुद्ध जनों को भी शामिल किया जाएगा। राज्य सरकार समिति से प्राप्त ड्राफ्ट को केंद्र को भेजेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को विधानसभा स्थित सभाकक्ष में पत्रकारों से बातचीत में मंत्रिमंडल के निर्णय की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति और विरासत सदियों से भारतीय सभ्यता का हिस्सा है। देवभूमि वेदों-पुराणों, ऋषियों-मनीषियों के ज्ञान और अध्यात्म का केंद्र रही है। सामरिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण राज्य है। राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने से सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों को बल मिलेगा।
सामाजिक समरसता बढ़ेगी, लैंगिक न्याय को बढ़ावा:
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में सामाजिक समरसता बढ़ेगी। लैंगिक न्याय को बढ़ावा और महिला सशक्तीकरण को शक्ति मिलेगी। साथ ही इस हिमालयी क्षेत्र की असाधारण सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पहचान और पर्यावरण को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता कानून दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण होगा। अन्य राज्यों से भी इसे लागू करने का अनुरोध किया जाएगा।
धामी बोले, संविधान निर्माताओं के सपनों को करेंगे पूरा:
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार का यह कदम संविधान निर्माताओं के सपनों को पूरा करने की दिशा में अहम कदम होगा और संविधान की भावना को साकार करेगा। संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों के भाग-चार के अनुच्छेद-44 के अंतर्गत सरकार को समान नागरिक संहिता कानून बनाने का अधिकार तो है ही, बल्कि ऐसा करने की अपेक्षा भी की गई है। संविधान निर्माताओं ने सरकार को निर्देशित किया है कि वह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगी।
उच्चतम न्यायालय ने भी दिए हैं निर्देश:
मंत्रिमंडल में बाबा साहब डा भीमराव आंबेडकर का इस संबंध में दृष्टिकोण भी रखा गया। बाबा साहब ने कहा था कि हमारे देश में मानवीय संबंधों के अनेक उदाहरण हैं जो समान नागरिक संहिता को दर्शाते हैं और सारे देश में एक समान हैं, लेकिन विवाह और उत्तराधिकार के विषय में समान नागरिक संहिता अभी भी नहीं है। अत: देश में समान नागरिकता लागू करनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर इसे लागू करने पर जोर दिया है। अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम एवं अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि समान नागरिक संहिता से देश में एकता को मजबूती मिलेगी। यह विभिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को संविधान के प्रति पृथक आस्था को खत्म करेगा। कोई भी समुदाय इस विषय में स्वत: पहल नहीं करेगा। अत: समान नागरिक संहिता लाना सरकार का दायित्व है।
गोवा पेश कर चुका है उदाहरण:
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस निर्णय को लागू करने में हमें गोवा राज्य से भी प्रेरणा मिलती है, जिसने एक प्रकार की समान नागरिक संहिता लागू कर देश में उदाहरण पेश किया है। अन्य राज्यों में इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुए। गोवा के बाद उत्तराखंड भी देश का ऐसा राज्य बन जाएगा। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता पर गठित होने वाली समिति उत्तराखंड राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के व्यक्तिगत नागरिक मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रासंगिक कानूनों की जांच करने और मसौदा कानून में संशोधन पर विचार करेगी। साथ ही विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार से संबंधित लागू कानून और विरासत, गोद लेने और रखरखाव व संरक्षता पर भी अपनी रिपोर्ट देगी। सरकार अधिसूचना के माध्यम से समिति का गठन करेगी। इसमें उसकी संरचना, संदर्भ की शर्तों का उल्लेख होगा


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