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किशाऊ बांध: उत्तराखंड का बिजली संकट होगा दूर, लेकिन क्या टिहरी बांध विस्थापन से लिया सबक? जानें सबकुछ

Uk Fast Khabar September 17, 2026

किशाऊ बांध परियोजना पर बनी सहमति के बाद उत्तराखंड के लिए जमीन उपलब्धता और पुनर्वास नीति होगी बड़ी चुनौती. रिपोर्ट- रोहित सोनी

देहरादून: पिछले 86 सालों से लंबित पड़ी किशाऊ बांध परियोजना का रास्ता साफ हो गया है. इसके लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के साथ ही देश के 6 राज्यों के बीच 15 सितंबर को एमओयू साइन हो गया है. ऐसे में इस परियोजना के निर्माण के बाद देश के 6 राज्यों को सीधे लाभ मिलेगा. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच बहने वाली टौंस नदी पर बनने वाले इस बांध की वजह से 17 गांव/उप गांव प्रभावित होंगे, जिनका विस्थापन किया जाएगा.

ये प्रस्तावित बांध भारत का दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा और दुनिया का 12वां बड़ा बांध होगा. भारत का सबसे बड़ा बांध उत्तराखंड का टिहरी बांध है. ऐसे में इस बांध परियोजना से उत्तराखंड राज्य को कितना फायदा मिलेगा? परियोजना के लिए उत्तराखंड सरकार को कितना खर्च वहन करना होगा? और टिहरी बांध पुनर्वास नीति से सबक लेते हुए प्रभावित परिवारों के विस्थापन के लिए क्या कुछ व्यवस्था रहने वाली है? आइए विस्तार से जानते हैं.

देश की आजादी से पहले ब्रिटिश काल के दौरान किशाऊ बांध परियोजना की कवायद साल 1940 में शुरू हुई थी. लेकिन तमाम राज्यों के बीच पानी के बंटवारे, लागत और तकनीकी मुद्दों पर सहमति न बन पाने के कारण ये महत्वाकांक्षी परियोजना करीब 86 सालों तक फाइलों में लंबित पड़ी रही. लेकिन 15 सितंबर 2026 को गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में देश के 6 राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के बीच हुए एमओयू के बाद रास्ता साफ हो गया है. जिसका सबसे ज्यादा फायदा उत्तराखंड के साथ ही हिमाचल प्रदेश को मिलेगा. उत्तराखंड के देहरादून जिले और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर मौजूद टौंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा बांध बनेगा.

दरअसल, किशाऊ बांध परियोजना के लिए 12 मई 1994 को एक समझौता हुआ था. जिसके तहत बेसिन में आने वाली हर भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौते किए जाएंगे. ऐसे में साल 2019 में लखवाड़ और रेणुकाजी परियोजनाओं के विवाद समाप्त होने के बाद किशाऊ के काम को आगे बढ़ाया गया.

  • भारत सरकार ने किशाऊ परियोजना को साल 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया.
  • इस परियोजना में कुल 15 हजार 624 करोड़ रुपए खर्च होंगे.
  • करीब 90 फीसदी वित्तीय भार भारत सरकार वहन करेगी.
  • बाकी 10 प्रतिशत राशि, साल 1994 को हुए समझौते के मुताबिक राज्यों की ओर से वहन की जाएगी.

अगर राज्यों के हिस्सेदारी की बात करें. सबसे अधिक हरियाणा राज्य को 478.85 करोड़, उत्तर प्रदेश को 298.76 करोड़, राजस्थान को 93.51 करोड़, दिल्ली को 60.50 करोड़, उत्तराखंड को 38.19 करोड़ और हिमाचल प्रदेश को 31.58 करोड़ रुपए वहन करने होंगे.

50-50 प्रतिशत मिलेगी दोनों राज्यों को बिजली: किशाऊ बांध बनने के बाद ये बांध भारत देश का दूसरा सबसे बड़ा और एशिया का 12वां सबसे ऊंचा बांध बन जाएगा. किशाऊ बांध परियोजना के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनेगा. जहां 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल एकत्र होगा. इससे 97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत भी प्राप्त होगा. इस बांध से पैदा होने वाली 422 मेगावाट बिजली में से 50-50 फीसदी बिजली दोनों राज्यों यानी 211 मेगावाट बिजली उत्तराखंड और 211 मेगावाट बिजली हिमाचल प्रदेश को मिलेगी.

परियोजना को लेकर 6 राज्यों के बीच एमओयू साइन होने के बाद अब इस परियोजना के अंतिम मंजूरी के लिए प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल के सम्मुख रखा जाएगा. जिस पर सहमति मिलने के बाद परियोजना के निर्माण कार्य संबंधित प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.

5 हजार लोगों का होगा पुनर्वास: किशाऊ बांध परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए 17 गांवों के करीब साढ़े पांच हजार लोगों का पुनर्वास करना होगा, जो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर बसे हुए हैं. किशाऊ कॉरपोरेशन से मिली जानकारी के अनुसार,

‘उत्तराखंड राज्य के 9 गांवों के 3406 लोग और हिमाचल प्रदेश के 8 गांवों के 2092 लोगों का पुनर्वास करना होगा. इसके अलावा, एक बड़ी चुनौती उत्तराखंड राज्य के लिए यह भी है कि इस परियोजना के लिए करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि को ट्रांसफर करने की जरूरत होगी’.

साल 2018 में किए गए सर्वे के अनुसार, उत्तराखंड और हिमाचल के 81 हजार 300 पेड़, 631 लकड़ी से बने मकान, 171 पक्के मकान, 8 मंदिर, 6 पंचायतें, 2 अस्पताल, 7 प्राइमरी स्कूल, 2 मिडिल स्कूल और 1 इंटर कॉलेज जलमग्न होंगे.

उत्तराखंड में जमीन की उपलब्धता चुनौती: उत्तराखंड के 9 गांव में रह रहे करीब 3406 लोगों का पुनर्वास और 25,00 हेक्टेयर वन भूमि की क्षतिपूर्ति के लिए अतिरिक्त भूमि की उपलब्धता राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है. इसके पीछे की मुख्य वजह यह है कि उत्तराखंड में पहले से ही भूमि की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है. ऐसे में जिन 9 गांव के लोगों का विस्थापन किया जाना है, उसके लिए जमीन की उपलब्ध करना एक बड़ी चुनौती है.

इसके अलावा, इस परियोजना के लिए 25,00 हेक्टेयर वन भूमि को ट्रांसफर करना होगा. जिसकी क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए इतने ही हेक्टेयर भूमि की जरूरत होगी. जिसको देखते हुए उत्तराखंड सरकार, भारत सरकार के साथ ही अन्य इस परियोजना से जुड़े हुए राज्यों से अनुरोध कर रहा है कि क्षतिपूरक वनीकरण के लिए आवश्यक भूमि चिन्हित करने में राज्य का सहयोग करें.

टिहरी बांध विस्थापन की दो दशक पुरानी पीड़ा और लंबे संघर्ष के बाद किशाऊ बांध परियोजना में ‘पहले पुनर्वास, फिर निर्माण’ का रास्ता सरकार अपना सकती है. नई नीति में जमीन के बदले जमीन, चार गुना नकद मुआवजा, महिलाओं और हाशिए के समुदायों को अलग इकाई मानना और दो राज्यों के लिए एक समान पैकेज जैसे बड़े बदलाव भी शामिल हैं.

टिहरी परिवार विस्थापन में आई थी दिक्कत: दरअसल, टिहरी बांध परियोजना में हजारों परिवार विस्थापित हुए थे लेकिन पुनर्वास में कई खामियां सामने आईं. ऐसे में उत्तराखंड सरकार, टिहरी से मिले सबक को देखते हुए किशाऊ बांध परियोजना के प्रभावितों का पुनर्वास करेगी.

टिहरी बांध परियोजना के पुनर्वास नीति में मिलीं ये खामियां: टिहरी बांध परियोजना में हजारों परिवार विस्थापित हुए, लेकिन पुनर्वास में कई खामियां देखने को मिली. जमीन की कीमतें कम आंकी गईं, जिससे विस्थापितों के लिए नई जमीन खरीदना मुश्किल हो गया. एलॉटेड जमीन कटाव और कम उपजाऊ निकली, जिससे लोगों की आजीविका प्रभावित हुई. पूरे गांव को साथ रखने के बजाय परिवारों को अलग-अलग जगह बसाया गया, जिससे सामाजिक तानाबाना टूट गया. एससी/एसटी और महिलाओं की जरूरतों को नजरअंदाज किया गया, जिससे घरेलू और आजीविका का बोझ बढ़ गया. शीर्ष स्तर पर फैसले होने से स्थानीय लोगों में अविश्वास पैदा हुआ और लंबे समय तक आंदोलन भी हुए. इसके अलावा, 26 साल बाद भी कई पुनर्वास स्थलों पर सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएं अधूरी हैं.

किशाऊ बांध परियोजना में उत्तराखंड के करीब 3400 लोगों के प्रभावित होने का आकलन है. इसके लिए व्यापक पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन (R&R) योजना बनाई गई है. नीति में लैंड एक्यूशन, रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट, 2013 (LARR Act 2013) के प्रावधानों के साथ-साथ विशेष पैकेज शामिल किए गए हैं. जिसके तहत, निर्माण से पहले पुनर्वास और ‘जमीन के बदले जमीन’ की व्यवस्था, जिन किसानों की अधिकांश या पूरी जमीन परियोजना में आएगी, उन्हें वैकल्पिक कृषि भूमि दी जाएगी. सीमांत और आदिवासी बहुल इलाकों में प्रभावित परिवारों को न्यूनतम एक एकड़ कृषि भूमि देना अनिवार्य किया गया है, चाहे उनकी जमीन कम ही क्यों न रही हो.

पुनर्वास नीति में क्या-क्या है: इसके साथ ही विस्थापितों को प्राथमिकता से ऐसे क्षेत्रों में जमीन देने का प्रयास है, जो सिंचाई नेटवर्क से जुड़े हों, जिससे वे पुनर्वास के बाद खेती शुरू कर सकें. अगर वैकल्पिक कृषि भूमि उपलब्ध नहीं होती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य का 4 गुना मुआवजा दिया जाएगा. मकान परियोजना के क्षेत्र में आने वाले परिवारों को नई पुनर्वास कॉलोनियों में 200 से 250 वर्ग मीटर का विकसित प्लॉट निःशुल्क दिया जाएगा.

लैंड एक्यूशन, रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट, 2013 (LARR ACT) के तहत, हर प्रभावित परिवार को रोजगार या 20 साल तक एन्युटी, आवास इकाई, एक साल का सबसिस्टेंस भत्ता, परिवहन भत्ता, पशुशाला/दुकान/कारिगर वर्कशॉप, 50 हजार रुपए का एकमुश्त पुनर्वास भत्ता, 12 महीने तक 3 हजार रुपए मासिक सबसिस्टेंस और वैकल्पिक आजीविका के लिए प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं दी जाएगी.

किशाऊ बांध परियोजना में इन्हें विशेष पैकेज के तहत और बेहतर किया जा रहा है. टिहरी में महिलाओं और हाशिए के समुदायों की उपेक्षा के सबक को ध्यान में रखते हुए, किशाऊ में वयस्क महिलाओं और अविवाहित बेटियों को अलग इकाई मानकर मुआवजे और पुनर्वास कॉलोनियों में समान अधिकार दिए जा रहे हैं. किशाऊ बांध परियोजना के दायरे में उत्तराखंड के 9 गांव और हिमाचल प्रदेश के 8 गांव आ रहे हैं. ऐसे में अंतरराज्यीय विवादों से बचने के लिए किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड (KCL) नामक एसपीवी के जरिए दोनों राज्यों के विस्थापितों के लिए एक समान मुआवजा और पुनर्वास पैकेज तय किया गया है.

टिहरी में स्थानीय अविश्वास और आंदोलन के अनुभव के बाद, किशाऊ में सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) के तहत ग्राम सभाओं के साथ सीधा संवाद और जनसुनवाई भी अनिवार्य की गई है. इससे विस्थापितों की आपत्तियों को अंतिम योजना में शामिल किया जा सकेगा और भरोसा बनेगा. किशाऊ में नई नीति कागज पर मजबूत है, लेकिन टिहरी के अनुभव से साफ है कि अमल और निगरानी काफी अधिक महत्वपूर्ण है. ऐसे में विशेषज्ञ और नागरिक समूहों ने LARR Act के साथ-साथ R&R योजना पर सतत निगरानी, समयबद्ध धनराशि जारी करना और बुनियादी सुविधाओं की गारंटी पर जोर दिया है. यदि ये कदम समय पर और पारदर्शी तरीके से किए गए, तो किशाऊ टिहरी की गलतियों को सुधारने वाला मॉडल बन सकता है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कहा कि,

समझौता हस्ताक्षर कार्यक्रम के दौरान सीएम धामी ने भारत सरकार के सामने अपनी कुछ कठिनाइयों का भी जिक्र किया. जिस पर भारत सरकार ने ये निर्णय लिया है कि उत्तराखंड की मांगों को भारत सरकार की योजनाओं में समाहित करने का प्रयास किया जाएगा और भविष्य में उत्तराखंड पर आने वाले वित्तीय भार के वहन में भी मदद की जाएगी. इस परियोजना से सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होगा. क्योंकि जब यमुना के जल का बंटवारा हुआ, तब नीति-निर्धारकों की ओर से एक बड़ी चूक हुई थी. उस दौरान यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह की गणना ही नहीं की गई और जितना जल उपलब्ध था, वो सब राज्यों के बीच बांट दिया गया. नदी के लिए जल छोड़ा ही नहीं गया. किशाऊ परियोजना समझौते से 25 प्रतिशत जल आएगा, वो दिल्ली और यमुना दोनों के लिए काफी लाभकारी सिद्ध होगा. इससे पर्यावरण संरक्षण भी होगा.
-अमित शाह, गृह मंत्री-

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, उसके बाद से ही 10 से अधिक बड़े-बड़े विवाद जो अन्य राज्यों के बीच में चल रहे थे, उनका समाधान निकला है. राज्यों के बीच विवादों का सिर्फ समाधान नहीं निकला है, बल्कि दोनों पक्ष संतुष्ट भी हुए हैं. इसके साथ ही उत्तराखंड में भी जो योजनाएं दशकों से लटकी हुई थी, जिसमें लखवाड़ बांध परियोजना, जमरानी बांध परियोजना, देहरादून की सौंग बांध परियोजना के साथ ही अब किशाऊ बांध परियोजना का रास्ता साफ हो गया है.

किशाऊ बांध परियोजना का निर्माण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच होना है, इसके साथ ही अन्य चार राज्यों को भी इसका पानी मिलेगा. विशेष कर दिल्ली को पानी का अधिक लाभ मिलेगा, क्योंकि दिल्ली में यमुना नदी की सफाई की जो एक बड़ी चुनौती है. इस बांध के बनने के बाद यमुना नदी की सफाई की दिशा में एक अच्छा प्रयास होगा. सबको स्वच्छ पानी मिलेगा और यमुना नदी साफ होगी जिससे गंगा खुद ही साफ हो जाएगी.
-पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड-

किशाऊ बांध परियोजना से उत्तराखंड को बिजली और पेयजल भी मिलेगा. इस परियोजना से एक तरफ उत्तराखंड को लाभ मिलेगा तो दूसरी तरफ प्रदेश के लिए एक बड़ी चुनौती भी है, क्योंकि 2500 हेक्टेयर वन भूमि को इस परियोजना के लिए ट्रांसफर करना होगा. ऐसे में इसकी क्षतिपूर्ति के लिए जमीन भी उपलब्ध करानी होगी, जिस कारण समझौता हस्ताक्षर कार्यक्रम के दौरान इस विषय को भी रखा गया है.

इस परियोजना से जुड़े राज्य और भारत सरकार इसमें मदद करेगी, इसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री ने आश्वासन दिया है. इसके अलावा, पावर हाउस बनाने के लिए जो धनराशि खर्च होगी, उसके लिए भारत सरकार से हर साल शासकीय मद में मिलने वाली धनराशि के अतिरिक्त धनराशि की मांग की गई है. जिस पर भारत सरकार ने भी आश्वासन दिया है कि वो उपलब्ध कराएंगे. इस परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए राज्य में जमीन उपलब्ध न होने की बात की कही गई है, साथ ही सभी से सहयोग भी मांगा गया है जिस पर भारत सरकार और अन्य राज्य सरकारें, इस दिशा में सहयोग करेंगी.
-पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड-

एशिया में मौजूद ऊंचे बांधों की स्थिति:

  • ताजिकिस्तान देश में निर्माणाधीन रोगुन बांध की ऊंचाई 335 मीटर है.
  • चीन देश के शुआंगजिआंगकोउ बांध की ऊंचाई 315 मीटर है.
  • चीन देश के जिन्पिंग-1 बांध की ऊंचाई 305 मीटर है.
  • ताजिकिस्तान देश के नूरेक बांध की ऊंचाई 300 मीटर है.
  • चीन देश के लियांगहेकोउ बांध की ऊंचाई 295 मीटर है.
  • चीन देश के शिआओवान बांध की ऊंचाई 292 मीटर है.
  • चीन देश के बैहेतन बांध की ऊंचाई 289 मीटर है.
  • चीन देश के शिलुओदू बांध की ऊंचाई 285.5 मीटर है.
  • चीन देश के नोजहादु बांध की ऊंचाई 261.5 मीटर है.
  • भारत देश के टिहरी बांध की ऊंचाई 260.5 मीटर है.
  • चीन देश के लाक्सिवा बांध की ऊंचाई 250 मीटर है.
  • भारत देश का किशाऊ बांध (प्रस्तावित) की ऊंचाई 232 मीटर है.
  • भारत देश का भाखड़ा नांगल बांध की ऊंचाई 225.55 मीटर है.

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