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मातृ मृत्यु के भारी जोखिम से गुजर रहा उत्तराखंड! हकीकत पेश कर रहे तुलनात्मक आंकड़े

Uk Fast Khabar June 15, 2026

रिपोर्ट के अनुसार देश का औसत एमएमआर 87 है. उत्तराखंड का एमएमआर 99 होने के कारण राज्य राष्ट्रीय औसत से 12 अंक अधिक है.

देहरादून: उत्तराखंड में मातृ मृत्यु के आंकड़े चिंताजनक हालातों को बयां कर रहे हैं. स्थिति ये है कि राष्ट्रीय औसत से पीछे चल रहा उत्तराखंड देश के कई बड़े राज्यों से मुकाबला कर रहा है. ये हालात हाल ही में जारी हुए साल 2024 की उस रिपोर्ट से सामने आए हैं जिसमें मातृ मृत्यु अनुपात को राज्यों के स्तर पर सार्वजनिक किया गया है. जानिए क्या कहते हैं आंकड़े? पड़ोसी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड की क्या स्थिति है? आइये जानते हैं.

देश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. मगर हाल ही में जारी वर्ष 2022-24 के मातृ मृत्यु अनुपात (Maternal Mortality Ratio) के आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है. रिपोर्ट के अनुसार भारत का औसत मातृ मृत्यु अनुपात 87 है, जबकि उत्तराखंड में यह 99 दर्ज किया गया है. इसका मतलब है कि राज्य में प्रत्येक एक लाख जीवित जन्मों पर औसतन 99 महिलाओं की गर्भावस्था, प्रसव या प्रसवोत्तर जटिलताओं के कारण मृत्यु हो रही है.

उत्तराखंड की स्थिति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों से बेहतर है, लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों और कई विकसित राज्यों की तुलना में यह अंतर काफी बड़ा दिखाई देता है. माना जा रहा है कि पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की चुनौतियां और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं.

राष्ट्रीय औसत से पीछे उत्तराखंड: रिपोर्ट के अनुसार देश का औसत एमएमआर 87 है. उत्तराखंड का एमएमआर 99 होने के कारण राज्य राष्ट्रीय औसत से 12 अंक अधिक है. यह संकेत देता है कि मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्य को अभी और सुधार की आवश्यकता है. राज्य का मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) 6 है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 5 है. वहीं लाइफटाइम रिस्क यानी किसी महिला के जीवनकाल में मातृ मृत्यु का जोखिम 0.21 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 0.18 प्रतिशत है. यह भी बताता है कि उत्तराखंड में गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ा जोखिम देश के औसत से अधिक बना हुआ है.

यूपी, एमपी से बेहतर, लेकिन संतोषजनक नहीं: अगर उत्तराखंड की तुलना उत्तर भारत और ईएजी (Empowered Action Group) राज्यों से की जाए तो स्थिति इन बड़े राज्यों से भी मुकाबला करने वाली दिखाई देती है.

जानिए क्या है इन महत्वपूर्ण राज्यों के आंकड़े

  1. उत्तर प्रदेश का एमएमआर – 154
  2. मध्य प्रदेश का एमएमआर – 135
  3. छत्तीसगढ़ का एमएमआर – 124
  4. ओडिशा का एमएमआर –124
  5. बिहार का एमएमआर – 96
  6. राजस्थान का एमएमआर – 87
  7. झारखंड का एमएमआर – 82
  8. असम का एमएमआर – 84
  9. उत्तराखंड का एमएमआर – 99

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तराखंड की स्थिति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से भी मुकाबला कर रही है, हालांकि राज्य की स्थिति इन बड़े राज्यों से बेहतर है. उधर बिहार, झारखंड, असम और राजस्थान जैसे राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. विशेष रूप से झारखंड का एमएमआर 82 और असम का 84 दर्ज किया गया है, जो उत्तराखंड से काफी कम है. इससे संकेत मिलता है कि भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद कुछ राज्यों ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर परिणाम हासिल किए हैं.

दक्षिण भारत ने पेश किया आदर्श मॉडल: रिपोर्ट में सबसे उल्लेखनीय तथ्य दक्षिणी राज्यों का प्रदर्शन है. यहां मातृ मृत्यु अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम है.दक्षिण भारत के राज्य केरल का एमएमआर – 24, तमिलनाडु का एमएमआर – 25, आंध्र प्रदेश का एमएमआर – 39, तेलंगाना का एमएमआर – 48, कर्नाटक का एमएमआर – 73 है. दक्षिण भारत का औसत एमएमआर केवल 41 है, जो उत्तराखंड के 99 की तुलना में आधे से भी कम हैं. केरल और तमिलनाडु में मातृ मृत्यु का जोखिम मात्र 0.04 प्रतिशत है, जबकि उत्तराखंड में यह 0.21 प्रतिशत है. यानी इन राज्यों की तुलना में उत्तराखंड की महिलाओं के लिए मातृ मृत्यु का जोखिम लगभग पांच गुना अधिक है.

मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य नेटवर्क, संस्थागत प्रसव की उच्च दर, नियमित प्रसवपूर्व जांच और आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की बेहतर उपलब्धता ने दक्षिणी राज्यों को यह सफलता दिलाई है.

पश्चिमी और विकसित राज्यों से भी पीछे: देश के अन्य विकसित राज्यों के आंकड़े भी उत्तराखंड के लिए चुनौती पेश करते हैं. महाराष्ट्र का एमएमआर – 37, गुजरात का एमएमआर – 64, पंजाब का एमएमआर – 77, हरियाणा का एमएमआर – 94, पश्चिम बंगाल का एमएमआर – 94 है. इनमें महाराष्ट्र का प्रदर्शन सबसे बेहतर है. राज्य का एमएमआर केवल 37 है. गुजरात और पंजाब भी उत्तराखंड से काफी आगे हैं. हरियाणा और पश्चिम बंगाल का एमएमआर 94 है, जो उत्तराखंड के 99 से थोड़ा कम है. इससे स्पष्ट है कि उत्तराखंड अभी मध्य श्रेणी के राज्यों में शामिल है. उसे अग्रणी राज्यों की श्रेणी में पहुंचने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे.

पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौती: उत्तराखंड की परिस्थितियां मैदानी राज्यों से भिन्न हैं। राज्य के अनेक गांव दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं. जहां स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचना कठिन है. गर्भवती महिलाओं को कई बार अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. बरसात, भूस्खलन और सड़क संपर्क बाधित होने जैसी समस्याएं भी समय पर उपचार में बाधा बनती हैं. स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल कहते हैं कि राज्य सरकार की तरफ से स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रयास किया जा रहे हैं. दुर्गम क्षेत्र और पर्वतीय इलाकों के कारण कई बार आंकड़े प्रतिकूल दिखाई देते हैं. इसके बावजूद कोशिश की जा रही है कि तमाम योजनाओं को पर्वतीय क्षेत्र तक पहुंचाकर इन आंकड़ों को बेहतर किया जाए.

स्त्री रोग विशेषज्ञों और एनेस्थेटिस्ट की कमी भी लंबे समय से राज्य के स्वास्थ्य तंत्र की चुनौती रही है. कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ सेवाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं.

किस उम्र में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु

  1. 15-19 वर्ष – 5 प्रतिशत
  2. 20-24 वर्ष – 30 प्रतिशत
  3. 25-29 वर्ष – 36 प्रतिशत
  4. 30-34 वर्ष – 18 प्रतिशत
  5. 35-39 वर्ष – 8 प्रतिशत
  6. 40-44 वर्ष – 2 प्रतिशत
  7. 45-49 वर्ष – 1 प्रतिशत

सबसे ज्यादा 36 प्रतिशत मातृ मौतें 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में हुई हैं. इसके बाद 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग का स्थान है, जहां 30 प्रतिशत मातृ मौतें दर्ज हुईं. यह आंकड़ा बताता है कि मातृ मृत्यु का संकट केवल किशोर गर्भधारण तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रजनन आयु की सामान्य महिलाओं में भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. उत्तराखंड में भी स्वास्थ्य योजनाओं का फोकस इसी आयु वर्ग पर होना आवश्यक है.

क्या कहते हैं आंकड़े: उत्तराखंड का एमएमआर 99 होने का मतलब यह नहीं है कि स्थिति अत्यंत खराब है, लेकिन यह भी स्पष्ट संकेत है कि राज्य अभी राष्ट्रीय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है. संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत मातृ मृत्यु अनुपात को 70 से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है. यदि उत्तराखंड को इस लक्ष्य तक पहुंचना है तो उसे अपने वर्तमान स्तर से लगभग 30 प्रतिशत की अतिरिक्त कमी लानी होगी.

समाजसेवी साधना शर्मा कहती है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में उत्तराखंड में बेहद ज्यादा काम करने की जरूरत है. जिस राज्य और देश में महिलाओं की स्थिति बेहतर है और वह सशक्त है. इस देश का विकास संभव है, लेकिन जिस तरह के आंकड़े उत्तराखंड के दिखाई दे रहे हैं वह हतोत्साहित करने वाले हैं. इसमें सरकार को जरूरी कदम उठाने चाहिए.

उधर मनोवैज्ञानिक डॉ श्रवि अमर अत्रि भी इन आंकड़ों को देखकर चिंतित दिखाई देती हैं. उनका कहना है कि राज्य के लिए यह आंकड़े बेहद खराब संदेश देते हैं. ऐसी स्थिति में राज्य सरकार को इस दिशा में कदम उठाने चाहिए. डॉ श्रवि अमर अत्रि कहती हैं की महिलाओं पर इस दौरान बेहद ज्यादा दबाव होता है. ऐसे में इस स्थिति में मनोचिकित्सक की भूमिका काफी अहम हो जाती है. इसलिए सरकार को शारीरिक रूप से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी विचार करना चाहिए.

राज्य में मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत मानी जा रही है. इसमें दूरस्थ क्षेत्रों में आपातकालीन प्रसूति सेवाओं का विस्तार, हाई-रिस्क गर्भधारण की समय रहते पहचान, प्रसवपूर्व जांच (ANC) की गुणवत्ता में सुधार, विशेषज्ञ डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता बढ़ाना, गर्भवती महिलाओं के लिए रेफरल और एंबुलेंस नेटवर्क को मजबूत करना, पर्वतीय क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन की सुविधा, मोबाइल मेडिकल यूनिट्स का विस्तार करना शामिल है.

 

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