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पहाड़ की संपदा को बाहरी मॉडल की जरूरत नहीं, खेती में छिपा है उत्तराखंड की उन्नति का सबसे बड़ा जवाब : डॉ. प्रेमचंद शर्मा

Uk Fast Khabar September 9, 2026

पद्मश्री डॉ. प्रेमचंद शर्मा ने ईटीवी भारत से खास बातचीत की. उन्होंने अपने जीवन की प्रगति, खेती के मॉडल के बारे में बताया. रिपोर्ट-धीरज सजवाण

देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन रोकना हो, गांवों को फिर से आबाद करना हो और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने हों तो आखिर रास्ता क्या है? क्या पहाड़ों में बड़े उद्योग लगाए जाएं? क्या होटल और पर्यटन को इसका आधार बनाया जाए ? या फिर पहाड़ की अपनी जमीन, जलवायु और कृषि क्षमता को ही अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाया जाए?

ये सवाल लंबे समय से सरकार और नीति-नियंताओं के सामने हैं. लेकिन चकराता के हटाल गांव के रहने वाले पद्मश्री प्रगतिशील किसान डॉ. प्रेमचंद शर्मा का जवाब बेहद सरल है. पहाड़ के पास रोजगार पैदा करने की क्षमता पहले से है, जरूरत सिर्फ उसे वैज्ञानिक तरीके, बाजार और प्रसंस्करण से जोड़ने की है. डॉ. प्रेमचंद शर्मा से खास बातचीत में उन्होंने अपनी खेती की यात्रा, अनार से शुरू हुए प्रयोगों, जैविक खेती, युवाओं के कृषि की ओर लौटने, बाजार की समस्या और गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के मॉडल पर खुलकर बात की.

  • इनके बारे में जानें: डॉ. प्रेमचंद शर्मा का जन्म देहरादून के जौनसार-बावर के चकराता ब्लॉक के अटाल गांव में साल 1957 में हुआ. उनके पिता एक किसान थे. डॉ. शर्मा ने महज 5वीं तक की शिक्षा प्राप्त की है. प्रेमचंद साल 1984 से 1989 तक सैंज-अटाल ग्राम पंचायत के उप प्रधान और साल 1989 से 1998 तक प्रधान रहते हुए समाज की सेवा की. इसके बाद उत्तर प्रदेश जनजाति विकास प्राधिकरण में 1990 से 1993 तक तीन साल सदस्य रहे.
  • एक अनार से शुरू हुआ सफर, जिसने किसान को बना दिया प्रयोगधर्मी: डॉ. प्रेमचंद शर्मा की कहानी किसी कृषि विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि घर के पास खड़े एक अनार के पेड़ से शुरू होती है. वह बताते हैं कि, उनके घर के पास गणेश प्रजाति का अनार का पेड़ था. फल बड़े होते थे, लेकिन उनमें कीड़े लग जाते थे. परिवार की पुरानी मान्यता थी कि यह कीड़े वाला अनार है. लेकिन डॉ. शर्मा ने इसे किस्मत मानने के बजाय इसका कारण तलाशना शुरू किया.

    उद्यान विभाग के अधिकारियों से जानकारी ली तो पता चला कि अनार में फूल आने के समय कीट नियंत्रण जरूरी है. उन्होंने उसी आधार पर प्रयोग किया और फल बचाने में सफलता मिली. डॉ. शर्मा के मुताबिक, एक समय उनके एक पेड़ से करीब 40 पेटी अनार तैयार हुए और एक-एक अनार का वजन भी असाधारण था. लेकिन यहां एक नई समस्या सामने आई. बाजार को अनार के अंदर का स्वाद ही नहीं, बाहर की चमक भी चाहिए थी. यही वह दौर था जब उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की अनार की किस्मों को समझना शुरू किया.

    महाराष्ट्र के सोलापुर और हिमाचल से किस्में लाकर प्रयोग किए और करीब 2200 पौधे तैयार किए. इसके बाद उनका संपर्क कर्नाटक के बड़े किसान बसवराज पाटिल से हुआ. पाटिल के विशाल अनार बागान को देखने पहुंचे तो डॉ. शर्मा को ड्रिप सिंचाई और बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक खेती का नया अनुभव मिला. यहीं से उन्हें यह भरोसा मिला कि पहाड़ की परिस्थितियों में भी वैज्ञानिक तकनीक को अपनाकर खेती को बदला जा सकता है. उनके प्रोफाइल के मुताबिक, 1994 में उन्होंने लगभग 0.4 हेक्टेयर क्षेत्र से अनार की खेती शुरू की थी. बाद में अपने खेतों पर उन्नत पौध तैयार करने और तकनीक को दूसरे किसानों तक पहुंचाने का काम किया. सन 2000 से उन्होंने अपने खेत पर ही उन्नत अनार पौध तैयार करने की नर्सरी शुरू की और बड़ी संख्या में पौध दूसरे क्षेत्रों के किसानों तक पहुंचाई.

    अनार से सेब तक, पहाड़ की जलवायु को चुनौती देने का प्रयोग: डॉ. शर्मा की खासियत यही रही कि उन्होंने किसी एक फसल को अंतिम समाधान नहीं माना. अनार के बाद उन्होंने सेब पर भी प्रयोग शुरू किया. उनका गांव करीब 940 मीटर की ऊंचाई पर है, जहां पारंपरिक तौर पर सेब की खेती आसान नहीं मानी जाती. उन्होंने कम चिलिंग आवश्यकता वाली किस्म तलाश की और उसके लिए खेत में कृत्रिम तरीके से ठंड का वातावरण तैयार करने का प्रयोग किया.

    उनके मुताबिक, उन्होंने पेड़ों के ऊपर पाइपलाइन बिछाकर सर्दियों में शाम के समय फॉगिंग की, जिससे पेड़ों को जरूरी चिलिंग मिल सके. वह इसे अभी भी शोध और प्रयोग की प्रक्रिया मानते हैं. उनका कहना है कि,

    अगर किसान कुछ नया करने की ठान ले तो पहाड़ की परिस्थितियां हमेशा बाधा नहीं बनतीं. खेतों में ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, रंगीन शिमला मिर्च, फूलगोभी, टमाटर, चेरी टमाटर, लाल पत्तागोभी और दूसरी फसलों के साथ प्रयोग किए गए हैं. खेत पर ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई, प्लास्टिक मल्च और अलग-अलग सब्जी फसलों के प्रयोग दर्ज हैं.
    -डॉ. प्रेमचंद शर्मा, पद्मश्री प्रगतिशील किसान-

    कस्तूरी मृग जैसा है उत्तराखंड, रोजगार की तलाश में बाहर क्यों भटकें युवा: डॉ. प्रेमचंद शर्मा की बातचीत का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि उत्तराखंड के पास रोजगार का आधार बाहर से लाने की जरूरत नहीं है. वह उत्तराखंड की तुलना कस्तूरी मृग से करते हैं. डॉ. शर्मा के मुताबिक,

    उत्तराखंड के पास अलग-अलग ऊंचाई और जलवायु का ऐसा वातावरण है, जहां कई तरह की कृषि और बागवानी संभव है. इसके बावजूद युवा सरकारी नौकरी या कम वेतन वाली नौकरियों के पीछे शहरों की ओर जा रहे हैं. कृषि सिर्फ किसान बनने का काम नहीं है, बल्कि बीज, पौध, नर्सरी, उत्पादन, परिवहन, प्रसंस्करण और बाजार तक रोजगार की पूरी श्रृंखला तैयार करती है.
    -डॉ. प्रेमचंद शर्मा, पद्मश्री प्रगतिशील किसान-

    वह अपने अनुभव से बताते हैं कि, उनके क्षेत्र में ऐसे युवा भी हैं जिन्होंने स्नातक करने के बाद कृषि को रोजगार के रूप में चुना है और वो अच्छी इनकम जनरेट कर रहे हैं. उनका संदेश साफ है, युवा नौकरी मांगने वाला नहीं, नौकरी देने वाला बने. उनके गांव और आसपास किए गए काम का असर भी उनके प्रोफाइल में दर्ज है. 2013 में करीब 200 कृषक परिवारों को जोड़कर फल और सब्जी उत्पादक समिति बनाई गई.

    प्रोफाइल के मुताबिक, दो दशक के प्रयासों के बाद लगभग 225 किसान परिवार फल और सब्जी उत्पादन से जुड़े और कुछ ऐसे लोग भी गांव वापस लौटे जो रोजगार के लिए बाहर चले गए थे. आसपास के 25 से अधिक गांवों में भी किसानों ने इस मॉडल को अपनाया और करीब 1000 किसान इससे लाभान्वित हुए.

    किसान पैदा कर सकता है, लेकिन बाजार कौन देगा?: डॉ. प्रेमचंद शर्मा के मुताबिक, पहाड़ की कृषि की सबसे बड़ी कमजोरी उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार है. किसान अगर मेहनत करके टमाटर, गोभी या दूसरी सब्जियां पैदा कर भी ले, लेकिन बाजार में लागत के मुताबिक दाम न मिले तो अगली बार वह खेती छोड़ सकता है. यही वजह है कि वह पहाड़ में फूड प्रोसेसिंग इकाइयों को बेहद जरूरी मानते हैं. उनका तर्क है कि,

    जब किसी फसल का बाजार भाव गिर जाए तो उसे फेंकने या औने-पौने दाम पर बेचने के बजाय उसी समय प्रसंस्करण कर दिया जाए. टमाटर से पाउडर या दूसरे उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिन्हें लंबे समय तक रखा जा सके. इससे किसान की आय गिरने के बावजूद वैकल्पिक आय मिल सकती है.
    -डॉ. प्रेमचंद शर्मा, पद्मश्री प्रगतिशील किसान-

    यानी उनका मॉडल सिर्फ ‘उगाओ और बेचो’ तक सीमित नहीं है. उनका जोर ‘उगाओ, प्रसंस्करण करो, मूल्य बढ़ाओ और बाजार तक पहुंचाओ’ वाली पूरी व्यवस्था पर है. यही वह बिंदु है जिसे वह पहाड़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार मानते हैं. इंटरव्यू में उन्होंने सरकार से भी आग्रह किया कि, किसानों के लिए ऐसी प्रसंस्करण व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि बाजार भाव गिरने पर किसान निराश होकर खेती छोड़ने को मजबूर न हों.

    काली हल्दी से सहजन तक, स्थानीय उत्पादों में देखते हैं नई अर्थव्यवस्था: डॉ. प्रेमचंद शर्मा का प्रयोग सिर्फ पारंपरिक फल-सब्जियों तक सीमित नहीं है. वह काली हल्दी, सहजन और करी पत्ते जैसे स्थानीय उत्पादों को भी संभावित आर्थिक अवसर मानते हैं. खास तौर पर काली हल्दी को लेकर उनका मानना है कि अगर इसका व्यवस्थित बाजार विकसित किया जाए तो पहाड़ के किसानों को नया विकल्प मिल सकता है. सहजन को लेकर वह इसे खेत और घर दोनों स्तर पर उपयोगी मानते हैं. उनका जोर इस बात पर है कि स्थानीय उत्पादों को सिर्फ पारंपरिक तरीके से इस्तेमाल करने के बजाय उनके नए उपयोग और मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाएं. सहजन के पत्तों से खाद्य उत्पाद बनाने से लेकर पशु आहार में इसके संभावित इस्तेमाल तक की बात वह करते हैं. यहां भी उनका मूल विचार वही है.

    ‘पहाड़ की संपदा को पहाड़ के बाहर से आए किसी बड़े मॉडल की जरूरत नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच और बाजार की जरूरत है.’

    सरकार की भूमिका, सही किसान तक पहुंचे सही योजना: डॉ. प्रेमचंद शर्मा सरकार की योजनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं करते. बल्कि उनका कहना है कि, योजनाओं का लाभ वास्तव में काम कर रहे किसानों तक पहुंचना चाहिए. उन्होंने अपने क्षेत्र में सिंचाई के लिए प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत 20 सौर पंप मिलने का उदाहरण दिया. उनके मुताबिक,

    जिस जमीन पर पहले सिंचाई की समस्या के कारण खेती की कल्पना मुश्किल थी, वहां पानी उपलब्ध होने के बाद खेती संभव हुई. जिले के प्रगतिशील किसानों को जोड़कर ऐसा तंत्र बनाया जा सकता है, जहां किसान ही दूसरे किसानों को व्यावहारिक सलाह दें. क्योंकि जिस व्यक्ति ने खेत में प्रयोग करके सफलता हासिल की है, वह दूसरे किसान को जमीन की वास्तविक परिस्थितियों के हिसाब से ज्यादा उपयोगी मार्गदर्शन दे सकता है.
    -डॉ. प्रेमचंद शर्मा, पद्मश्री प्रगतिशील किसान-

    इन सम्मान और पुरस्कारों से हो चुके सम्मानित:

    2012 में किसान भूषण (उत्तराखंड सरकार).

    2014 में किसान सम्मान (इंडियन एसोसिएशन ऑफ सॉयल एंड वॉटर कंजर्वेशन)

    2014 में किसान सम्मान (भारतीय कृषि अनुसंधान)

    2015 में कृषक सम्राट सम्मान (महिंद्रा एंड महिंद्रा)

    2015 में विशेष उपलब्धि सम्मान (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान)

    2015 में प्रगतिशील कृषि सम्मान (गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर)

    2016 में उत्तराखंड विस्मृत नायक सम्मान (स्वदेशी जागरण मंच)

    2018 में जसोदा नवानी सम्मान (उत्तराखंड सामाजिक संस्था धाद)

    2018 में जगजीवन राम किसान पुरस्कार (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद)

    2021 में पद्मश्री (भारत सरकार)

    2024 में गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि दी गई

    PM मोदी से मुलाकात की यादें: बातचीत के अंत में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात का जिक्र आया तो डॉ. प्रेमचंद शर्मा भावुक हो गए. उन्होंने बताया कि,

    पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने उनसे व्यक्तिगत तौर पर बातचीत की और उत्तराखंड से जुड़ी उनकी पहचान को याद किया. प्रधानमंत्री की याददाश्त ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया. मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ने मेरे पहाड़ी पहनावे और पहले की मुलाकात से जुड़े संदर्भ को पहचान लिया और बातचीत की.
    -डॉ. प्रेमचंद शर्मा, पद्मश्री प्रगतिशील किसान-

    डॉ. शर्मा ने प्रधानमंत्री से कहा कि, उनकी पारदर्शी नीतियों की वजह से एक अनपढ़ किसान को इतना बड़ा मंच देखने का अवसर मिला. जवाब में प्रधानमंत्री ने उनके संघर्ष को बाबा केदार के आशीर्वाद से जोड़ा. प्रेमचंद शर्मा के लिए यह मुलाकात आज भी उनकी सबसे यादगार स्मृतियों में शामिल है. वह प्रधानमंत्री के जन्मदिन के मौके पर उनके लिए शुभकामनाएं देते हुए कहते हैं कि, देश को ऐसे नेतृत्व और अवसर देने वाली व्यवस्था की जरूरत है, जो गांव और किसान को भी विकास की मुख्यधारा में जगह दें.इस तरह से प्रगतिशील किसान डॉ. प्रेमचंद शर्मा की पूरी कहानी को अगर एक लाइन में समेटें तो उनका मॉडल यही कहता है- पहाड़ में रोजगार पैदा करने के लिए पहाड़ को छोड़कर बाहर देखने की जरूरत नहीं है. खेत, पानी, जलवायु, स्थानीय उत्पाद और किसान के अनुभव को तकनीक, बाजार और प्रसंस्करण से जोड़ दिया जाए तो यही गांव अर्थव्यवस्था का केंद्र बन सकते हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि नीति-नियंता इस मॉडल को कितनी गंभीरता से समझते हैं और जमीन पर लागू करते हैं.

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